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Poetry
Broken
By Sharon Mohan In those perilous hours which seem endless, She seeks the refuge of none; She walks across her golden cage, circling her steps; Over and over again; Her heart racing, In despair, In doubt, In absolute cluelessness; Of the unknown tomorrow, the uncertainties of which, have cast a stain on her soul; She finally stops, her mind and heart exhausted more than her feet; Her eyes too tired to even get moist, Her soul searching for answers; Answers ---- which sh
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Dec 12, 20251 min read
My Sun
By Kriti Arora I still remember, vividly. How your eyes shined Green and yellow in the dark Embers in a dark room – Firelight. Lighting up the dark forest That was my heart. I still remember, vividly How you would walk into a room Confident, gleaming Like the Sun’s rays personified You were, are, and will always be My Sun Too close, yet too far A flame, burning brightly Yet warm enough to touch I still remember, vividly Everything about you Is burned To the back of my Br
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Dec 12, 20251 min read
Dust
By Kriti Arora Your lips are made of dust. They crumble When I kiss you. The rest of you is glass You shatter Into a million pieces When I touch you. But then I pick you up, And patch you up. To build something More beautiful Than your previous self. Because you, my love Aren’t broken. You’re mended with lacquer And flakes of gold. Whole as you are, Complete unto yourself. By Kriti Arora
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Dec 12, 20251 min read
Cherry
By Kriti Arora I’ll kiss you with my Cherry red lips. In the dark of the Night. I’ll drown you In the elixir of my youth. I’ll kiss you With blood, flesh, and teeth. I’ll paint you violet And blue, Through and through. I’ll break your heart A million times And then I‘ll make it Whole again; Just to break it once more. Our sanguinary tragedy Will go on For eons and eons. Over and over and over Until you bequeath Your sinew and soul, And the fibres of your being To me. By Kr
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Dec 12, 20251 min read
Crimson
By Kriti Arora You’ll find me Resting under The shade Of a Sycamore tree. Biting into juicy flesh; Blood dripping down my neck; Saline water dripping from Two symmetrical voids Of anguish and desire, That you simpletons Call “eyes”. By Kriti Arora
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Dec 12, 20251 min read
पितृसत्ता
By Varsha Rani जवानी में जो क्रांतिकारी स्त्री-विमर्श था मुझे बहुत लुभाता, आज बुढ़ापे की दहलीज़ पर अक्सर उसका सार मुझे क्यों समझ में नहीं आता I साड़ी, सिन्दूर, चूड़ी, बिछिया, हार, नथिया, झुमके, बेसर, पायल, कंगन, क्यों लगते थे, ये सब तब सिर्फ बंधन I शोषण की ये थीं सब निशानी, जर्जर ये परम्पराएं थीं मिटानी I किसको थी खबर कि तथाकथित अंधेरों में उजाले भी छिपे रहते हैं, बेटी से माँ के अनूठे सफ़र के सारे धूप-छाँह पलते हैं I खुली हवा में सांस लेने के लिए सड़कों पर जब उतरे थे हम,
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Dec 12, 20252 min read
ज़िन्दगी की शाख
By Varsha Rani ज़िन्दगी की शाख पर बैठा हुआ परिंदा हूँ मैं, तेरी अनाम गलियों का बाशिंदा हूँ मैं, तेरी दुनिया में दिखे रंगों पर शर्मिंदा हूँ मैं, क्या सिर्फ तेरी कश्मकशों का कारिन्दा हूँ मैं ? तू शमां बनकर इतरा, क्योंकि तेरा पतंगा हूँ मैं, पर हाय ! इतना ख्वार न कर, तेरा ही तो नुमाइंदा हूँ मैं, अपनी रहमतों से क्यों करता है, महरूम मुझे, ज़िन्दा हूँ, अरे ! अभी तो ज़िन्दा हूँ मैं I By Varsha Rani
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Dec 12, 20251 min read
दुष्कर्म
By Varsha Rani कितनी मन्नतों से तुझे पाया, कितनी हसरतों से तुझे गोद खिलाया, कितनी उम्मीदों से तुझे परवान चढ़ाया, पर, हाय कैसा यह संसार रचा मैंने, उस एक काली रात को, तेरा शर्म भी ढँक नही पाया I By Varsha Rani
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Dec 12, 20251 min read
रचना
By Varsha Rani ज़िन्दगी खुशियों से भरी मचलती रही, शब्दों का भाव और रंगों का जाल फेंक कर हमें लुभाती रही I मैंने शब्दों को बुना, तुमने रंगों को चुना, न कूँची ने तुम्हारे रंग बिखेरे, न शब्दों ने मेरे भाव उकेरे, हम दो दिग्गज कलाकार, लेकिन एक दूजे से बेज़ार, लेखा-जोखा ही बस करते रहे, क्या पाया क्या खोया, बस यही सिर धुनते रहे, रहना था फिर कोरा पन्ना, मन से जब मन ही मिला ना, रह गए साथ-साथ चलते हुए, रेल की पटरियों से अकेले-अकेले I By Varsha Rani
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Dec 12, 20251 min read
भ्रूण हत्या
By Varsha Rani कतरा-कतरा वो दर्द सहती रही, अपने जिस्म का नासूर खुरचती रही, अपनी ममता का गला घोंटती रही, कभी जीती कभी मरती रही, रात भर, शबनम बरसती रही, और उसका आँचल भिगोती रही, यूं अम्मा की निगाहों की नमी तो सबने देखी, लेकिन, बाबा की आँखों से टपकी जो लहू की बूंदें, उसकी सीलन सिर्फ मेरे रेशे-रेशे में उतरती रही, मिट्टी की काया को जब मिट्टी में दबाया, तब जिस्म के साथ मेरी रूह भी ठंडी हुई I जाओ, आज अपना खून बख्शती हूँ, तुम्हें, मैं जानती हूँ, तुम मुझे कभी ना बिसराओगे I मै
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Dec 12, 20251 min read
आंधी
By Varsha Rani डर की इक पक्की दीवार थी, वो उस पार था, मैं इस पार थी, रात बड़ी भारी थी, खामोश अंधियारी थी, बेचैनी तारी थी, फिर भी, हिम्मत नहीं हारी थी I उसकी सांसे बेईमान, आफत में थी मेरी जान, दीवानी आंधी ने तोड़ी जब यह दीवार, आँचल हो गया तार-तार, मैं न मानूंगी फिर भी हार, रोशनी भला कब होती है दागदार ? बेदर्द आँधियां जब भी कभी आती हैं, धरती का पोर-पोर मसल-मसल जाती हैं, कुचली हुई धरती फिर से रूह अपना जगाती है, मचलती हुई लहरें कब गंगा को डराती हैं ? कहते हैं, जो यह धरत
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Dec 12, 20251 min read
ज़रुरत
By Varsha Rani जब सांस ज़हर बन जाती है, सीने में कहर जगाती है, जब रेशा-रेशा बिखरता है और रेज़ा-रेज़ा ढहता है I जब ज़ीस्त की सूनी राहें हों, हमसाया अपनी आहें हों, जब मंज़िल नहीं दिखाई दे, जो सहारा दे, वो ना बाहें हों I तेरी इतनी सुंदर दुनिया में खुशियों के कुछ ही वसंत जिए, फिर काली सी इस बरखा के खारे-खारे आंसू ही पिए I मिट्टी के खेल-खिलौने हम, तू गढ़ता है, फिर तोड़ता है, ना जाने किन अपराधों के भरपूर सज़ा हमें देता है I तेरी रहमत ने जब मिट्टी से मेरा जिस्म गढ़ा और जान भरी, सब
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Dec 12, 20251 min read
सपना
By Varsha Rani तेरे अस्तित्व का हिस्सा थी मैं नौ माह, तू तो देने वाली थी मुझे जीवन की नई छाह ? वो जो गायीं थी लोरियां, बुने थे सपने, वो सिर्फ तेरे नहीं, मेरे भी थे अपने I जिनके काँपते हाथों ने मुझे दफनाया, नीम-अँधेरे, उनका क्यों नहीं जकड़ा तूने सुबह-सवेरे ? कबतक ख़ामोशी से सिर्फ दर्द सहती जाएगी ? कभी दूं अग्निपरीक्षा, कभी बांधू आंखों पर पट्टी, यही सिखलाएगी ? माँ, तू तो धरती है, ज़रा टिकने तो दे, पिता, तू आसमान है, एक उड़ान भरने तो दे I माँ मेरी मिट्टी है, पैरों से रौंदी
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Dec 12, 20251 min read
छाया
By Varsha Rani किसी के आस पास होने का एहसास नहीं, इसलिए सीने की हूक और आँखों की नमी जाती नहीं I क्यों पीले पत्तों के झड़ने का मातम करती हूँ ? उसने तो बिखरे हुए फूलों को चुन लेना हमें सिखलाया I क्यों तेज़ चलती आँधियों से डर जाती हूँ ? उसने तो तूफ़ान से ही भिड़ जाने को हमें समझाया I क्यों रात के अंधियारे मुझे सहमाते हैं ? उसने तो उम्मीद का दिया रौशन करना हमें बतलाया I परिवर्तन तो संसार का नियम है, कहा था उसने - मिट्टी को एक दिन मिट्टी में मिल जाना है I फिर बदलते हुए मौसम का
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Dec 12, 20252 min read
धूप
By Varsha Rani ज़िन्दगी की धूप तूने बड़ा तपाया, रुपहले आईने तूने ढलती उम्र का अक्स दिखाया, राह के काँटों तुमने पैरों को बड़ा उलझाया, एक अंधे मोड़ पर खड़े हुए, अचानक यह क्यों याद आया ? कि अब तो करलूं हिसाब, कि क्या खोया और क्या पाया ? तुम्हें सुख देने को हर तरीका अपनाया, अपने ही देह और मन की कारा में खुद को बंदी बनाया, फिर भी जीवन में क्यों हमेशा खुद को अकेला ही पाया ? क्या-क्या नहीं छोड़ा पाने को तुम्हारा हाथ ? बाबा का प्यार, माँ का दुलार, भाई का साथ, बहनें, सखियां, मायके के
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Dec 12, 20253 min read
आईने के सवाल
By Dr. Monis Rizwan चेहरे पढ़ने का हुनर सीखा, सोचा दुनिया को आज आज़माएँगे, ज़माने की असलियत को आज हम आईना दिखाएँगे। हमारा ये ख़याल सुना तो आईना भी हँस पड़ा, बोला — न जाने एक चेहरे पे कितने चेहरे लगा बैठे हैं लोग। अपनी सच्चाई को एक सवाल बना बैठे हैं लोग। ये बदलते चेहरे देख तो मैं भी हैरान हो जाता हूँ, अपनी आवाज़ पे ख़ुद ही सवाल हो जाता हूँ। आप ज़माने की इस गुत्थी को सुलझाएँगे कैसे? हज़ारों इन अस्कों में असलियत को पहचान पाएँगे कैसे? By Dr. Monis Rizwan
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Dec 12, 20251 min read
बालाएँ
By Dr. Monis Rizwan बालाएँ लूँ अब किस-किस की कितनी नफ़रतों को पनाह दूँ क्यों न महज़ ख़ुद से मिलाने को नज़रें मैं तुझको भुला दूँ? जीने को फिर वही लम्हों की आस लिए ख़ुद को कितनी मैं सज़ा दूँ? यादें होती सिर्फ़ तो अब तक भुला भी देता मुकम्मल जुदा करने उस दोस्ती को क्या अब अपना ही एक हिस्सा जला दूँ? By Dr. Monis Rizwan
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Dec 12, 20251 min read
गुफ्तगू
By Dr.Monis Rizwan चंद पल मिले जब आराम के, चल रहे थे हमारे दरमियाँ, सिलसिले ये कुछ सवाल के। गुफ्तगू ये मेरी थी खुद से, या थी ये चांद से? लफ़्ज़ों की जुस्तजू जो चल रही थी शाम से। अब चाहें मिसरे ये मेरे, मुझे पागलों का नाम दे… या किसी ऐसी ही शाम मिला दे मुझे, अपनी ही पहचान से। By Dr.Monis Rizwan
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Dec 12, 20251 min read
नादान शायर
By Dr.Monis Rizwan ना जाने लोग मुझे शायर क्यों कहते हैं? आम ही इंसान हूँ हाँ, थोड़ा नादान हूँ शायद इसी लिए जज़्बात छुपाने के रिवाज़ बचकाने से लगते हैं मुख़्तसर में एहसासात बयां करता हूँ फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है मेरे अश्क़ आँखों के बजाय क़लम से बहते हैं By Dr.Monis Rizwan
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Dec 12, 20251 min read
Missing Me
By Dr.Monis Rizwan When I say I miss the times we’ve had, It doesn’t mean that I miss — The laughs we shared, The tears we cried, Those fake midnight fights, Those countless, pointless escapades of our minds. Our bond — and you — honestly take the second seat. The thing I long for the most Is the me that used to be around you, The person that only you knew, The way you made me feel — Frank, genuine, modest yet bold, Completely unapologetic me. You showed me who I could be, My
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Dec 12, 20251 min read
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