छाया
By Varsha Rani
किसी के आस पास होने का एहसास नहीं,
इसलिए सीने की हूक और आँखों की नमी जाती नहीं I
क्यों पीले पत्तों के झड़ने का मातम करती हूँ ?
उसने तो बिखरे हुए फूलों को चुन लेना हमें सिखलाया I
क्यों तेज़ चलती आँधियों से डर जाती हूँ ?
उसने तो तूफ़ान से ही भिड़ जाने को हमें समझाया I
क्यों रात के अंधियारे मुझे सहमाते हैं ?
उसने तो उम्मीद का दिया रौशन करना हमें बतलाया I
परिवर्तन तो संसार का नियम है,
कहा था उसने -
मिट्टी को एक दिन मिट्टी में मिल जाना है I
फिर बदलते हुए मौसम का सोग क्या करना ?
शाख से टूटे हुए पत्तों का मातम क्यों हो ?
तीखे कांटों को क्यों समेटा है ?
उनसे दामन तुम्हारा चाक क्यों है ?
प्यार से टपके हुए फूलों को क्यों नहीं चुनती ?
उनसे अपने जीवन को क्यों नहीं महकाती ?
इन तेज़ चलती आंधियों से डरती क्यों हो ?
जो खौफ खाते हैं, तूफ़ान उनको सहमाते I
क्यों राह के नुकीले पत्थरों पर गिरती हो ?
क्यों ठोकरों के पार खड़ी मंजिल तुम्हें नहीं दिखती ?
क्यों रात के अंधियारे तुम्हें डराते हैं ?
क्यों उम्मीद का दमकता हुआ एक दीप तुम नहीं जलाती ?
क्यों मेरी सच्ची सीखों को तुमने बिसराया ?
कहा था हमेशा रहूँगा मैं हमराह,
न रहे जिस्म मेरा, तो भी मेरी याद रहे,
तुम्हारे साथ कोई और चले या न चले I
यह सच है,
उनकी जुदाई ने तो मुझे तोड़ दिया I
दुखों में डूबकर,
उनके हर फलसफे से मुंह मोड़ लिया I
उनकी बातों को करती हूँ, याद जो अब फिर से,
कुछ रेशमी साए मुझे बार-बार छू जाते हैं,
हौले से मेरे दुखते हुए मन को वे सहलाते हैं,
मेरे रिसते हुए सब ज़ख्मों पर,
यादों की ठंडी मरहम सी वो लगाते हैं I
कांपती उंगलियों पर एक मजबूत पकड़ का एहसास,
जिसने बचपन से जवानी तक मुझे थामा था,
डगमगाते हुए नन्हे पैरों को,
पहले उठना, गिरना और फिर चलना सिखलाया था I
जीवन की कड़ी धूप में छाया बनकर,
हर घड़ी साथ जिसको पाया था I
कौन कहता है, वो आस पास नहीं,
बाहर उन्हें तलाशते रहने का गलत किस्सा था I
जो मेरी रूह मेरी वजूद का हिस्सा था I
मेरी सांसो में महक उनकी है,
मेरी आँखों में चमक उनकी है,
कैसे मैं उनको भूल सकती हूँ,
याद जिनकी हमेशा आती है I
By Varsha Rani

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