बालाएँ
By Dr. Monis Rizwan
बालाएँ लूँ अब किस-किस की
कितनी नफ़रतों को पनाह दूँ
क्यों न महज़ ख़ुद से मिलाने को नज़रें
मैं तुझको भुला दूँ?
जीने को फिर वही लम्हों की आस लिए
ख़ुद को कितनी मैं सज़ा दूँ?
यादें होती सिर्फ़ तो अब तक भुला भी देता
मुकम्मल जुदा करने उस दोस्ती को
क्या अब अपना ही एक हिस्सा जला दूँ?
By Dr. Monis Rizwan

🥺🥺🥺 beautiful
🤌🤌
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Amazing