आंधी
By Varsha Rani
डर की इक पक्की दीवार थी,
वो उस पार था,
मैं इस पार थी,
रात बड़ी भारी थी,
खामोश अंधियारी थी,
बेचैनी तारी थी,
फिर भी, हिम्मत नहीं हारी थी I
उसकी सांसे बेईमान,
आफत में थी मेरी जान,
दीवानी आंधी ने तोड़ी जब यह दीवार,
आँचल हो गया तार-तार,
मैं न मानूंगी फिर भी हार,
रोशनी भला कब होती है दागदार ?
बेदर्द आँधियां जब भी कभी आती हैं,
धरती का पोर-पोर मसल-मसल जाती हैं,
कुचली हुई धरती फिर से रूह अपना जगाती है,
मचलती हुई लहरें कब गंगा को डराती हैं ?
कहते हैं, जो यह धरती अपवित्र है,
संशय में तो खुद उनका ही चरित्र है I
इस वेग को तो रूकना है, तेज को तो झुकना है,
अब इंकलाब लाना है, बस राह नहीं तकना है I
डोर बंधे डोर से, हाथ जब मिले अनेक,
एकता हमारी तब लाएगी नई भोर एक I
By Varsha Rani

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