भ्रूण हत्या
By Varsha Rani
कतरा-कतरा वो दर्द सहती रही,
अपने जिस्म का नासूर खुरचती रही,
अपनी ममता का गला घोंटती रही,
कभी जीती कभी मरती रही,
रात भर, शबनम बरसती रही,
और उसका आँचल भिगोती रही,
यूं अम्मा की निगाहों की नमी तो सबने देखी,
लेकिन,
बाबा की आँखों से टपकी जो लहू की बूंदें,
उसकी सीलन सिर्फ मेरे रेशे-रेशे में उतरती रही,
मिट्टी की काया को जब मिट्टी में दबाया,
तब जिस्म के साथ मेरी रूह भी ठंडी हुई I
जाओ, आज अपना खून बख्शती हूँ, तुम्हें,
मैं जानती हूँ, तुम मुझे कभी ना बिसराओगे I
मैं धरती हूँ, भला मेरे बिना तुम कहाँ टिक पाओगे,
मैं लौटूंगी फिर उस दिन,
जिस दिन तुम हौसला करके,
मेरे लिए एक नयी दुनिया बसाओगे I
By Varsha Rani

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