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।। एक माँ की सीख- रास्ता और पंख।।

Aug 4, 2025
2 min read

Updated: Aug 6, 2025

By Mukta Sharma Tripathi


मुझे लड़ना होगा।

हर वक्त हर पल,

खुद को मुझे गढ़ना होगा।


संघर्ष का ये पथ,

कभी नवीन था कहाँ?

घर बाहर सब जगह,

इधर-उधर यहाँ-वहाँ।


मैं छोटे-से कस्बे की लड़की,

सरकारी स्कूल में पढ़ी।

माना गरीब माँ की बेटी मैं,

शायद कमतर थी औरों से,

पर जब संभली।

खुद को जाना

सुखद भविष्य बुना।

कॉलेज मन का चुना।


लोकल बस की खड़-खड़ में भी

मैंने सपनों को कभी त्यागा नहीं।

हौंसला मेरा 

मुसीबतों समक्ष, कभी भागा नहीं।

मैंनें पंख नहीं लगाए थे।

क्योंकि कभी पंख देखे ही न थे।

मैं तो तिनकों को जानती थी।

जुगाड़ का फन था

और एक रात मैं उनको अपनी

ड्राइंग बुक में बीज आई थी।

फिर रोज उन पर कोमल 

छरहरे, मखमली-से

पंखों के फर बनाने का अभ्यास करने लगी।

रुकी नहीं, रोज पहले से बेहतर

बेहतर से बेहतरीन...

और एक दिन ड्राइंग बुक खुलते ही

वे मेरे स्टोर कमरे में फैल गए 

वे उड़ने लगे थे।

पहले मैं उनको सींचती थी।

अब वे मुझे सींचने लगे।

फिर मैं कैसे रुक सकती थी।

मेरे सपने साकार होने लगे।

कमतर होने के भाव डोलने लगे।

मैं आगे ही आगे बढ़ी थी।

मैं अपने पैरों पर खड़ी थी।


पर चुनौतियाँ हम लड़कियों का पीछा 

आसानी से कहां छोड़ती हैं।

सावधानी हटी नहीं, दुर्घटना घटी नहीं।

इस मुहावरे की लाइनें हमारा ही माथा फोड़ती हैं।


शादी के बाद फिर खुद को सिद्ध करने के लिए

घर में छपते प्रश्न पत्रों में उत्तीर्ण होने के लिए 

तुम्हें घर में छोड़ फिर सफर करने लगी।

पहले कस्बे से शहर जाती थी

अब मैं शहर से गाँव की यात्री थी।


बस तुम्हारे लिए,

क्योंकि तुम्हें मुझे अपनी पसंद के स्कूल में डालना था।

जो सबसे बढ़िया हो।

तुम्हें अपने जीवन से इतर 

कुछ बढ़िया माहौल में पालना था।


मगर ये पथ नहीं, रेगिस्तान था।

तूफ़ान के सामने कहां चलना आसान था।


फिर पंखों की खेती शुरु की।

बिना बीज के...

हल की जगह खुद को जोत कर,

जहां तुम्हें भेजने का सपना देखती थी।

वहीं नौकरी शुरु की..

हाँ तो ये कोई अहसान नहीं 

ये मेरा फर्ज था।

तुम्हारे लिए संस्कार था

कि 

जरूरी नहीं कि जीवन में रास्ते सामने दिखाई दें।

जरूरी नहीं की तीखे-अंधे मोड़ के बाद राह सपाट हो जाए। 

जरूरी नहीं कि रास्ते के सारे मील पत्थर अपनी जगह पर रहें।

जरूरी नहीं कि अंधेरी सुरंग पार कर सामने मंजिल मिल ही जाए।


मंजिलें हमसे खेलती हैं।

तुम इनसे खेलना सीखो।


तुम नियमों के पुजारी हो।

दूसरा मूर्ख सवारी है।

तुम्हारे ऊपर केवल अपनी नहीं उसकी भी जिम्मेदारी है।


यही सोच मंजिल तक ले जाएगी।

यही सोच यात्रा सुखद बनाएगी।


बेटा, ये जीवन मल्लखंभ है।

थम कर चलोगे तो यात्रा सदा आरंभ है।


By Mukta Sharma Tripathi


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