ज़िन्दगी के पल और तुम
By Dhara Prajapati
यूँ तोह हम थोड़े से ना समाज, अनजान इस दुनिया की दौड़ से,
यूँ तोह हम है नादान, नटखट से अल्हड मिजाज़ के,'
इस उलझी ज़िन्दगी में,
तुम आना सितारों के भीड़ से परे एक चाँद बनकर ।
मेरे आखों को देख कर,
बिना कहे वोह साड़ी बातें कर देना जो तुम्हारा मन कहना चाहता चाहता था।
क्या तुम ज़िन्दगी के लम्हे मुस्कुराकर जियोगे मेरे साथ?
इस ना समाज स लड़की के साथ चलोगे इस ज़िदगी के सफर में?
By Dhara Prajapati

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