ज़िन्दगी
By Dr. Imran A.K. Surti
बिन आवाज़ों के घर बन गया है बस खंडहर,
कुछ परिंदों से बड़ी आस लगा रख्खी है!
शर्त हमने भी हवाओं से लगा रख्खी है,
इक लौ शामो-पहर हमने जला रख्खी है!
चंद कतरों में मिट जाये मेरी प्यास नहीं,
प्यास दरिया की सिने में छुपा रख्खी है!
उन दरख्तों की उम्र लम्बी कैसे होगी,
हवाओं ने जड़ें जिनकी हिला रख्खी है!
कूचा, कूचा-ए-शहेर से उठ रहा है धुआं,
आग अरमानों की ये किसने जला रख्खी है!
वो पशेमान नहीं है मुल्के-सियासत करके,
और एक हम है की जिसने हया रख्खी है!
By Dr. Imran A.K. Surti

Comments