ज़हर की एक ‘विरासत’
- Hashtag Kalakar
- Dec 26, 2025
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By Aditya Nandkumar Garde
जंगल की खामोशी में, पंछियों की चहक गुम गई,
उनकी चहक चुप हो गई, तेरे शहर के शोर में दब गयी।
नदी खुद माँ बनकर, छोटे जीवों को जल से पाल रही थी,
हाथी अपने भारी कदमों से कहता है,
“क्यों तू ने तोड़ दिए हमारा जंगल, हमारे पेड़ हमारे घर?”
गाय की आँखों में आंसू भी नहीं,
बस उसके बच्चों की जुदाई का समंदर है,
प्रकृति ने जीवन दिया, तुमने उसे ही मार दिया,
पर इंसान सुन नहीं रहा, देख नहीं रहा।
शेर, बाघ अपनी दहाड़ रोक चुकें,
क्योंकि उसका शिकार पहले ही खत्म हो गया,
पंछियों की टोली आसमान से वंचित है,
इस तरह आसमान में सिर्फ जमीन बाकी है।
मछलियाँ अब नदी में नहीं खेल पाती,
नदियों की गीत में साथ नहीं दे पाती,
उनकी जुबान पे सिर्फ कांटे लगाए गए हैं,
इंसान सिर्फ अब इतिहास में रह गया है।
जंगल चीखता है, नदियाँ रोती है,
पर इंसान तो स्वार्थ में बहता जा रहा है,
प्रकृति को कमजोर बनाकर, खुद की ताकत दिखा रहा है,
पर जब प्रकृति अपनी ताकत दिखाएगी,
तब इंसान की ताकत, कमज़ोरी की हदें पार कर जाएगी।
हिरन, बंदर, कछुए, पंछी, सभी प्राणी मौन है,
क्योंकि इंसान ने उनकी आवाज छीन ली है,
जो कभी जीवन का आईना थे,
अब केवल उनकी परछाईयाँ रह गई है।
और अभी भी इंसान,
प्रकृति के अंधेरे में, अपने ही रौशनी में खोया,
प्रकृति के पुकार को नजरंदाज करता हुआ,
किसी के आंसुओं को नहीं देख पा रहा।
प्रकृति ने अपनी अंतिम जहरीली सांसें रोक ली,
पर ये कैसी ज़िद है इंसानो़ं की,
वह अपनी नस्लों के लिए,
केवल ज़हर की एक 'विरासत' छोड़ रहा है।
By Aditya Nandkumar Garde

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