ख़ासियत
By Noorussaba Shayan
उस घर में कुछ तो ख़ासियत थी
कहते हैं वहाँ शिफा रहा करती थी
सुना है बरकत भी अक्सर ठहरती थी
वहाँ की फ़िज़ा में मसर्रत महकती थी
दरो दीवार में हर पल हंसी गूंजती थी
उस घर में कुछ तो ख़ासियत थी
वहां न पाबंदियों की पहरेदारी थी
न रीत रिवाजो की ज़िम्मेदारी थी
किसी से न कोई राज़दारी थी
ख्वाबों में सबकी हिस्सेदारी थी
उस घर की यही तो ख़ासियत थी
खिली खिली सी हर शख्सियत थी
डर की कही नही कोई कैफ़ियत थी
वहाँ खुल कर जीने की रिवायत थी
हर चेहरे पर खुशी की इनायत थी।।।
By Noorussaba Shayan

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