ख़ामोशी की चादर
By Sunil Kumar Shukla
ख़ामोशी की चादर फेंको, थोड़ी हलचल होने दो ।
दरिया का बहना अच्छा है, उसमें कलकल होने दो ।।
खामोशी की...थोड़ी हलचल होने दो ..!!
करता शोर समंदर भी जब, ज्वार उठे ज़ज़्बातों का,
धरती अपना धैर्य छोड़, प्रतिकार करे आघातों का !
आसमान भी गुंजित होता, ख़ुशियों की बरसातों में,
गुमसुम होते चाँद - सितारे, घनी अँधेरी रातों में !
भाव-भवन भण्डार भरे इस, मन को चंचल होने दो !
ख़ामोशी की ...थोड़ी हलचल होने दो ..!!
बेशक़ सुर बेहद ऊँचा है, ख़ामोशी की भाषा का,
लिपियाँ लेकिन गूढ़ बहुत हैं, मूक हुई परिभाषा का !
मौन साध कब तक बैठोगे, राह तकोगे आशा का,
नीरवता पर्याय बन रही, बढ़ती हुई निराशा का !
मूक पहेली अनसुलझी है, इसका कुछ हल होने दो !
ख़ामोशी की...थोड़ी हलचल होने दो...!!
रात घनेरी भी अच्छी है, सुर-सरिता से सजी हो ग़र,
तारों की महफ़िल बेमानी, ख़ामोशी यदि गयी पसर !
साँसों की सरगम जीवन को, साधे रहती जीवन भर,
सुर-संसार उजड़ जाता है, सप्तम साधें मौन अगर !
सुर-साम्राज्य लिए तारों को, झंकृत पल पल होने दो !
ख़ामोशी की...थोड़ी हलचल होने दो ...!!
काम हवा का चलना है तो, दीपक का जलते जाना,
रुकना मौत - निशानी देखो, जीवन है चलते जाना !
वृत्ति अटल है समय-चक्र की, ख़ुद को सदा बदलते जाना,
सुख-दुःख की गति एक दिखे,उत्तुंग शिखर से ढलते जाना!
निर्बल पड़ते मन मरुथल को, थोड़ा सम्बल बोने दो !
ख़ामोशी की...थोड़ी हलचल होने दो...!!
ख़ामोशी की चादर फेंको, थोड़ी हलचल होने दो ।
दरिया का बहना अच्छा है, उसमें कलकल होने दो ।।
©सुनील
By Sunil Kumar Shukla

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