है शान्त सी जो जल रही………..
Updated: Sep 21, 2022
By Vishal Chaudhary
है जल रही जो शान्त सी,
वो घोर प्रचण्ड आग है
है शान्त सी जो एकांत सी,
वो शोर ब्रह्माण्ड जाग है
अभय चिरत्व मिलने को ,
वो विजयी तांडव आज है
निर्दय प्रभुत्व हिलने को ,
तो कालजयी पांडव आज है
जो मृत्यु का काल बने,
महामृत्युंजय प्रत्यक्ष हैं
जो राहु का काल बने,
वो सूर्योदय समक्ष हैं
कल-कल करती बह रही,
वो धारा नर संहार की
कब से है धरती कह रही,
चले हवस रक्त संचार की
चाँद भी है आज तपिश में,
वासुकि-शेष भरते फुँकार हैं
धरा फिर रंगने कपिश में,
वीरभद्र-रुद्र करते शृंगार हैं
मरण-मृदंग जो बज रहा,
वो अमृत्व को पाने को है
रक़्त से जीवन सींच रहा,
काली का खप्पर भर आने को है
अधकटे धड़ खण्ड खण्ड पड़े है,
ज्वाला में अगणित भस्म पड़े हैं
कट कट मुण्डों के पहाड़ खड़े हैं,
नृशंसियों के मद चूर पड़े हैं
रचनाकार स्वयं भगवान ही है,
सृजन भी खुद, सर्वनाश भी है
गुल भी खुद, बागवान भी है
मोक्षदायक रूप अविनाश ही है !!
By Vishal Chaudhary

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