हे! गिरधारी
By Mr. Anil kumar mandal
हे गिरधारी कलयुग में भी भेज दो अपने अंश।
धर्म धरा पर विकृत कर रहा दुर्योधन का वंश।
भीष्म, द्रोण तो शिथिल पड़े हैं मौज उड़ाता कंस।
हे गिरधारी कलयुग में भी भेज दो अपने अंश।
हर दिन बढ़ते मामा शकुनि, ले नुतन प्रपंच।
इस युग की पाँचाली, सुभद्रा झेल रही हैं दंश।
हे द्वापर के धर्म प्रणेता भेज दो अपने अंश।
पुनः धर्म की जय हो जाये, पाप का हो विध्वंस।
हे गिरधारी कलयुग में भी भेज दो अपने अंश।
भीष्म, द्रोण:- बुद्धिजीवी जो अन्याय के खिलाफ नहीं बोलते
कंस:- अत्याचारी
By Mr. Anil kumar mandal

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