"हिज्र(separation)
By Gursahil Gill
आज फिर तेरी याद आई
आज फिर हम मुसकुराए
आज फिर आया तूफान
आज फिर हमने दिए जलाए
आज फिर हुआ इश्क की बरबादी का एहसास
आज फिर आंखों में आंसू भर आए
पड़ता रहा दर्द-ए-हिज्र का कोहरा रात भर
फिर भी खत न तेरे मैंने जलाए
एक तुम हो जो मेरी सदा सुनकर भी न लौटो
एक तेरी याद है जो बिन बुलाए ही आ जाए
है साहिल की आदत कि इंतजार करे
मर्जी सफीनों की लौटकर आएं न आएं
एक तुम हो के दो कदम चले और घबराकर रुक गए
एक हम हैं जो तेरी ओर चले तो चलते ही आए
बिखरो को समेटे कौन यहाँ
सभी चाहते हैं घर बने-बनाए
By Gursahil Gill

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