हिंदी भाषा: मातृभाषा
By Prashant Rathi
व्यंजनोंकी तृप्ति से मैं उपजी, हूँ वो मुखकी स्मिता
विभूषित वस्त्रों से मैं चहकी, हूँ वो मनकी अस्मिता
मिट्टी व तृण से बनी मैं, छाँव दायिनी गृह आवास हूँ
मैं पुरातन शैलकी हूँ बेटी, वो नूतन राजनिवास हूँ
मैं सिंधु नगरी की प्रथा, मैं गोप्य सरस्वती की कथा,
मैं श्याम-यमुना की गीता, मैं विदूरों की अभिज्ञता,
वेदों के संस्करण में मैं, आचार्यों के संस्मरण में मैं,
परिवर्तन से प्रीत हो, वो शिष्य अभिजीत हूँ!
लीलाधरकी लीलाओं को गाता मैं ही सूरदास हूँ
श्रीराम के महिमाको भजता मैं ही तुलसीदास हूँ
यथार्थका वर्णन जो करता मैं ही मुंसी प्रेमचंद
मीरा बाई की सुमिरन हूँ, मैं ही हूँ भक्त रामानंद!
नाम हूँ, पहचान हूँ, मैं ही तुम्हारी ख्याति हूँ
सतत जीवनकी व्याख्या में मैं त्याग हूँ व प्राप्ति हूँ
विचार व व्यक्तिकी समसामयिक परिभाषा हूँ
मैं सरल सरिता वाणी हूँ, तुम्हारी हिंदी भाषा हूँ!
By Prashant Rathi

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