हादसा
Updated: Oct 4, 2024
By Gautam Anand
ये हादसा मेरी समझ में उम्र भर नहीं आया
जो रहबर था कैसे अपने ही घर नहीं आया
तोहमतें उछालते रहे सब एक-दूसरे पे मगर
किसी को अपना ऐब कभी नज़र नहीं आया
ये मौसम-ए-बहार में क्यूँ उदास है फ़िज़ाँ सारी
क्यूँ ज़र्द हुए पत्ते अभी तो पतझड़ नहीं आया
सख्त निगहबानी ने छीन ली है बाग की रौनक
अरसा हुए इस बाग में कोई पत्थर नहीं आया
बहुत बेचैन हो गया वो अपने हालात देखकर
दुखी बहुत था आँख में आँसू मगर नहीं आया
जाने किस अना में रहा कि जरा सी बात पर
ऐसा रूठ गया सुख कि वापस घर नहीं आया
कितने हिस्सों में बँट गया ये घर लेकिन
किसी के हिस्से मुकम्मल घर नहीं आया
By Gautam Anand

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