हाँ, मैं खो जाती हूँ
By Swati Kumari
हाँ, मैं खो जाती हूँ,
मैं खो जाती हूँ उन राहों में,
वो भूली-बिसरी यादों में,
उन यादों की बारातों में,
मैं खो जाती हूँ अपने ख़यालों में।
मैं सोचती थोड़ी ज़्यादा हूँ,
पर उम्र में तो आधी हूँ,
ना समझ सकूँ अपने मन की,
पर सुन लूँ मैं सबके दिल की।
हर बात सोच लेती हूँ मैं,
जो कहना नहीं, वो भी कह देती हूँ मैं,
हाँ, दिल मेरा थोड़ा साफ़ है,
इसी बात का तो मलाल है।
सब कहते हैं — “अभी बच्ची हूँ”,
और मैं अपने दिल की सच्ची हूँ,
क्योंकि सबने देखा हँसता हुआ चेहरा,
ना देखा उसके पीछे छुपा वो घाव गहरा।
मुस्कुरा लेती हूँ लोगों के घेरे में,
पर अकेली रोती हूँ अंधेरे में,
यही तो सयाने होने की पहली सीढ़ी है,
मुबारक हो, अब आ गई हूँ दुख मेले में।
पर शायद यही ज़िंदगी का रंग है,
दर्द के साथ जीने का सबका अपना ढंग है,
मुश्किलें तो हैं सबके हिस्से में,
आँसू भी लिखे हैं हर छोटे किस्से में।
शायद इसलिए… हाँ, मैं खो जाती हूँ,
पर अब अच्छी-सी यादों में,
वो खट्टी-मीठी बातों में,
जीवन की बीती राहों में,
वो यादों की दुकानों में।
शायद इसी खो जाने में सुकून है,
ख़यालों में रहना शायद जुनून है,
हाँ, मैं खो जाती हूँ हर बार,
पर निखर के बाहर आती हूँ — हर सोच के बाद।
By Swati Kumari

Lovely nice poem
Itni si age me itni deep soch ..wow...great thinking
🩵🩵
बहुत ही सुन्दर हर एक रचना,आपकी हर रचना अत्यंत गहरौली हुए और समय की वास्तविकता से अवगत करता है, ईश्वर की कृपा सदा आप पर बनी रहे🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏
Amazing words ✨