हाँ जी रहे कलियुग घनघोर में!
- Hashtag Kalakar
- Sep 17, 2025
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By Shobha Joshi
पंथता के विभोर में
उत्कृष्टता की होड़ में
उत्थान होता किंचित
पर पंथवादी सिद्धता की ही दौड़ में
क्या जी रहे कलियुग घनघोर में?
अभी तो यह प्रथम ही है चरण
मानवता का दिखता चहुं ओर हरण
पंथता सिद्धता का ही हो रहा वरण
गैरपंथी कतई बरदाश्त नहीं
कि साथ होवे उनका भी भरण
जाएं निरीह किसकी शरण
चाहते सरल जो जीवन हो या मरण
मुठिका भर सिद्धान्तवादी
व्यर्थ सी सिद्धान्तता के शोर में
क्या जी रहे कलियुग घनघोर में?
पंथता सिद्धान्तता सिद्धता
किस काम की वो
आत्मा से निरीहता दयालुता का दमन करे जो
अन्तरिक्ष की ऊँचाई किस काम की वो
चरित्र का लोक पाताल में स्थापन करे जो
नयन ज्योति और श्रवण शक्ति किस काम की वो
नैसर्गिकता का अनुभव कर पाये न -
अपितु मन मस्तिष्क में सिर्फ
वैमनस्य का ही विस्थापन करे जो
बढ़ रहे सब उन्नति पथ चढ़ रहे सब
पर उन्नति-बढ़ती किस काम की वो
नैतिकता सभ्यता और शीलता से
आचरण का विभाजन करे जो
आधुनिक सा आचरण, अभ्यास और
कदाचित हर चेष्टा हमारी
तो आधुनिकता के ऐसे ठौर में
क्या जी रहे कलियुग घनघोर में?
कहते है युग ये जो है इसमें
मात्रा हरि भजन, कथा श्रवण से ही
अपकर्म का नाश हो जायेगा
पर कदाचित युगी ये आंक न सके
कि युग में इस इतना अधिक
मानवता का हृास हो जायेगा
छोटी से अहमता के लिये
अपकर्म से परहेज न होगा
मानवता छोटी हो जायेगी
अन्य जातियों का वृहद विकास हो जायेगा
तो वृहद जातियों के वृहद दौर में
क्या जी रहे कलियुग घनघोर में ?
हाँ जी रहे कलियुग घनघोर में।
By Shobha Joshi

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