हाॅं होगे तुम सही
By Kriti Khandelwal
हाॅं होगे तुम सही,
मगर तुम्हारा सही मेरे लिए सही हो,
ये जरूरी तो नहीं ।।
पता नहीं तुम मुझे क्यों समझा रहे हो,
क्यों अपनी सोच को तुम बस सही बता रहे हो,
तुम्हारे समझ में हम ना समझ है,
मगर ठोकरों ने जो सिखाया है हमें वह सबसे सही और बेहतर सबक है ।
हाॅं होगे तुम सही,
मगर तुम्हारा सही मेरे लिए सही हो,
ये जरूरी तो नहीं ।।
तुम्हारे लिए जो रास्ता आसान हुआ,
मेरे लिए वो कांटों से भरा था,
तुम्हें जो लोग मिले वो साथ दिए होंगे,
हमने हर मोड़ पर हंस कर सिर्फ सहा
था।
हाॅं होगे तुम सही,
मगर तुम्हारा सही मेरे लिए सही हो,
ये जरूरी तो नहीं ।।
हमने जो देखा है, समझा है, सीखा है, पाया है,
तुम्हारी बातों को मानकर अपने तजुर्बे से कैसे मुंह मोड़ आगे बढ़ जाए?
हाॅं होगे तुम सही,
मगर तुम्हारा सही मेरे लिए सही हो,
ये जरूरी तो नहीं ।।
तो जब भी खुद की बातों को सही साबित करते हो,
एक बार गौर फरमाना,
जिसको तुम समझा रहे हो,
जिसे गलत कह कर तुम खुद को सही बता रहे हो,
उसके बारे में तुमने कितना जाना,
कैसे उसकी जिंदगी को तुमने अपने जैसा माना
हाॅं होगे तुम सही,
मगर तुम्हारा सही मेरे लिए सही हो,
ये जरूरी तो नहीं ।।
यहां जब इंसान अलग है,
उनके माहौल अलग है,
उनके एहसास अलग है,
उनके जज़्बात अलग है,
उनके ख्वाब अलग है,
तो जीने का तरीका अलग हो तो इसमें क्या गलत है?
हाॅं होगे तुम सही,
मगर तुम्हारा सही मेरे लिए सही हो,
ये जरूरी तो नहीं ।।
कहानी अलग है तो किरदार भी अलग है,
हर इंसान के व्यवहार भी अलग है,
कोई बस रुलाना जानता है,
खुद को सबसे ऊपर मानता है,
कोई हर किसी के लिए अपनी खुशी त्यागता है,
और खुद की जरूरत को हर बार टालता है,
इसलिए हाॅं होगे तुम सही,
मगर तुम्हारा सही मेरे लिए सही हो,
ये जरूरी तो नहीं ।।
By Kriti Khandelwal

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