हसीं मुस्तकबिल
By Vikas Kumar
मेरी बेसूद सी दुनिया थी मैं जीना भूल आया था।
कोई मुतरीब कहीं महफिल में गाना भूल आया था।
तरन्नुम तेरी जब गूंजी मेरे दिल की फिज़ाओ में।
तरंगे फिर से वो उठ्ठी मैं जिनसे दूर आया था।
तराने फ़िर से वो गूंजे जिन्हें मैं भूल आया था।
उमंगे फिर से वो उठ्ठी मैं जिनसे दूर आया था।
चांदनी से तर निशा तले तेरे चांद से आरिज़ को चूम कर।
इन केशुओ के मदमस्त घटा तले गुदाज बांहों में झूम कर।
इन सुर्ख़ लबों के प्याले से जब हमने शबनम का जाम पिया।
इस रूहानी इश्क़ में हमने फिर एक पल में सौ जन्म जीया।
उन सांसों की खुशबू इस हयात से फिर महकने लगी।
मरमरी पैकर के लचक से ये हयात फिर बहकने लगी।
उन नयनों के मदमस्त शोखियों के साए तले।
फिर हमारे हसीं मुस्तकबिल के साझे सपने पले।
By Vikas Kumar

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