“हवाओ का रूख”
By Renu singh
हवाओ के रूख का किस्सा बयां कर रहा है....
जैसे चल रही है साजिश मौसमो को खिलाफ कर रहा है।।।
एक कश्ती चली थी दरिया मे, मौजो से खेल खेलती कब तुफानो मे जा घिरी,
है उम्मीद किनारो की मुसाफिर आस कर रहा है।।।।
घटाओ ने आसमा को काली रात सी चादर ओढा दी,,
तेज उठती लहरो का शोर कानो मे नश्तर सा चुभोने लगा...
दिन से रात रात से दिन एक एक लम्हा.....
थमती सांसो सा गुजर रहा है।।
अब धीर भी आहिस्ता आहिस्ता दम तोडने लगा..
दूर तक एक नजर बहारो की मंजर की राह तकने लगा...
खत्म हो लहरो का जुनुन तो चैन आए....
फैला के दामन दिल सजदे कर रहा है।।।
जिंदगी रोज एक नये फलसफे को लिए मिलती है...
है मुश्किल बहुत पढना जिन्हें वो किताबो मे लिखती...
धुंधले ख्वाबो का फिर सजे आशियाना ...
पलको का घर राह तक रहा है.....
By Renu singh

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