हरीफ आईना
By Vijay Kumar Nagar
बेदर्द तक़दीर की नवाज़िश ने मुझे
दी हर क़दम पर मुझे. शिकस्त दर शिकस्त
तपते गमों की दुपहरी में चलते
राहत की छाँव का सुकून नसीब ना हुआ.
बीत गए कई बरस रियाज़ करते करते
अख्तर सहगल की तरह
फिर भी ग़ज़ल कहने का सऊर मुझे नसीब ना हुआ.
शहीद हो गए ना जाने
कितने दरख़्त घने जंगल के
फिर भी इंसान की आशियाना बनाने की
ख़्वाहिश का खात्मा ना हुआ.
रखते नहीं हैं वह तस्वीर मेरी आईने के साथ
तवज्जोह देना आईने को उनका
मेरी तस्वीर को गवारा ना हुआ.
याद आई होगी शायद कोई
उल्फत की भूली बिसरी बात
अश्क आँखों से बहते देखना उनके
मुझसे बर्दाश्त ना हुआ.
सँवरते देखते जाते थे
चेहरा मेरा आईने के साथ
कामयाब तारीफ में उनकी
मुकम्मल आईना ना हुआ.
By Vijay Kumar Nagar

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