हर जाम मुझे तेरी आँखों से फीका ही मिला
By Prakash Kumar Shukla
तेरा अक्स मेरी पलकों के चिलमन से झलकता है,
डूब जाता हूँ मैं, जब जाम तेरी आँखो से छलकता है।
मेरी हर साँस में तेरी ख़ुशबू समाई है,
जो मेरे साथ चलती है- वो तेरी ही परछाई है।
मैं शराबी नहीं फिर भी बैठा हूँ मयखाने में,
क्यूँकि आशिक़ों को जगह मिलती नहीं जमाने में।
क़सम तेरी! हलक से एक घूँट अभी उतारा नहीं है,
क्यूँकि मुझे तेरे प्यार से कुछ प्यारा नहीं है।
यहाँ प्याला, यहाँ साक़ी, यहाँ सलीका भी मिला,
अफ़सोस कि हर जाम मुझे तेरी आँखो से फीका ही मिला!
छोड़कर रिंदों का शहर बुझी महफ़िलो में आया हूँ,
और यहाँ भी आशिक़ों के क़ाफ़िलों पे छाया हूँ।
सोचता हूँ तेरे इंकार का फ़साना जो सुनाया मैंने,
अपने दिल के टुकड़ों का ख़ज़ाना जो दिखाया मैंने!
मेरी बात पे शायद उनको ऐतबार भी होगा,
पर रुसवा तो सिर्फ़ मेरा प्यार ही होगा!
चाहा तो दर्द को पलकों पे छिपाना मगर,
आँख से दो बूँद ढुलके मोती की नज़र।
उठी नज़रें तो हाथ में प्याले का सहारा पाया,
पर कमबख़्त भीगी आँखो को उसमें भी तेरा चेहरा नज़र आया!
लाके होंठों तक पीने से मुकर जाता हूँ,
समेटूँ जो दिल के टुकड़े तो मैं खुद ही बिखर जाता हूँ।
कहीं शर्बत का बहाना, कहीं ओलट का तरीका भी मिला,
अफ़सोस कि हर जाम मुझे तेरी आँखो से फीका ही मिला!
मेरे आइने में मेरा चेहरा है अभी मैं होश में हूँ!
लहू ख़ालिस है मेरा, रंग गहरा है, अभी मैं होश में हूँ!
दो घूँट जो भीतर गए, होश भी जाता रहा,
अक्स धुंधला हुआ मेरा, तेरा चेहरा नज़र आता रहा!
By Prakash Kumar Shukla

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