हम कुम्हार
By Jagrati Chaurasiya
हम कुम्हार अपनी माटी के जो चाहे वो गढ़ सकते हैं।
बेहतर से क्यो संतोष करे,जब बेहतरीन बन सकते हैं।
नाज़ुक ये माटी आहिस्ता-आहिस्ता आकार दीजिए।
जल्दबाज़ी से न आकार को ऐसे बिगाड़िए।
पहिए की चाल की ज़रा धीमी रखिए।
इतनी जल्दी में तो आप रचे भी नहीं गए।
इतनी नजरअंदाजी से ख़ुद को न तराशिए।
कुछ गुणो को आकार दीजिए अपने आप में।
फिर उनको बेशक साकार होते
देख पाएगे आप अपने आप में।
हम कुम्हार अपनी माटी के जो चाहे वो गढ़ सकते हैं।
बेहतर से क्यो संतोष करे, जब बेहतरीन बन सकते हैं।
By Jagrati Chaurasiya

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