हज़ार पन्ने
By Shreyansh Jayswal
मैंने कहा — खुली किताब हूँ मैं,
पन्ने पलटो तो सही,
भाषा आसान है मेरी,
मुझे पढ़ो तो सही।
ऐसा नहीं कि पाठक मिले नहीं मुझे,
कई पाठक आए मेरे पास,
कइयों ने पूरा पढ़ा मुझे,
कइयों ने पहला पन्ना पढ़कर बंद कर दिया मुझे,
कइयों ने पहला पन्ना पढ़कर दिलचस्प समझा मुझे,
और अपने घर ले जाकर किसी कोने में फेंक दिया मुझे,
और फिर "रद्दी" समझकर बेच दिया मुझे।
और जिन्होंने पढ़ा मुझे,
वे आज भी आते हैं मेरे पास,
मेरे साथ हँसते हैं, रोते हैं — और मैं...
मैं खुश होता हूँ उन्हें देखकर,
उन्हें भावुक होते हुए देखकर नहीं,
बल्कि उनके भाव व्यक्त करने का माध्यम बन पाता हूँ — इसलिए।
अब तो मैं किसी नए-नवेले पुस्तकालय के
किसी पुराने कोने में,
किसी पुरानी अलमारी में पड़ा रहता हूँ।
ऊपर से देखने पर ठीक दिखता हूँ शायद,
पर अंदर ही अंदर दीमक खाते जा रही है मेरे पन्नों को।
आज भी अपना पूरा ज़ोर लगाकर आवाज़ लगाता हूँ उन्हें —
कहता हूँ,
खुली किताब हूँ मैं,
पन्ने पलटो तो सही,
भाषा आसान है मेरी,
मुझे पढ़ो तो सही।
पर अब शायद पाठक
इस नए पुस्तकालय की चमक से विस्मय में पड़ जाते हैं,
और नई किताबों की चमक ज़्यादा भाती है उन्हें।
अब ज़्यादा ध्यान जाता नहीं उनका मुझ पर।
पर मैं... हिम्मत जुटाकर,
अपना पूरा ज़ोर लगाकर चीखकर बुलाता हूँ उन्हें,
और कहता हूँ —
खुली किताब हूँ मैं,
पन्ने पलटो तो सही,
भाषा आसान है मेरी,
मुझे पढ़ो तो सही।
By Shreyansh Jayswal

great poem
A very beautiful poem by a special artist . Reading this make you feel each and every wordings .....plz carry on ur work ans post more like this .........💖💐
Wow
Veryy beautifully written amazing work 👏🏻 😍
Very beautifully written amazing work 👏🏻👏🏻👏🏻😍😍😍