हौसला !
By Prathamesh Samant
घिर के आज ये रैना आयी है,
खौफ के अंधेरे संग लायी है...
दूर तक फैले हैं सुने सन्नाटें,
बेबासी की डगर संग चली आयी है...
कहें से लेकिन चलेगा एक सपना,
अरमानों की चिंगारी सुलगेगी कहीं...
कहीं से साज़ भरेगा एक जूनून,
हौसले का जुगनू परवाज़ करेगा कहीं...
कहीं से आज कारी बदरी आई है,
गमगीन सा मौसम सांग लायी है...
दूर से आ रही है आंधी की आहट,
तबाही है इरादा कर आयी है...
कहीं से फिर हलके फूटेंगे फुवारे,
गीली मिट्टी की खुशबू उड़ेगी कहीं...
कहीं पर रिम-झिम बरसेंगी बारिशें,
गुल्ज़ारों में बहारें लौटेंगी कहीं...
घिर के आज ये रैना आयी है,
खाली-खाली से लम्हें संग लायी है...
दूर तक फैलें हैं उलझान के अफ़साने,
रंजिशों की रतिबें संग लायी है...
किसी मोड़ पर लेकिन मिलेगी मंजिल,
झिलमिल सितारों का मंजर होगा कहीं...
कभी नींदों से फिर जागेगी उम्मीद,
दिलकश सावेरों से भी मुलाकातें होंगी कहीं...
By Prathamesh Samant

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