स्वीकृति
By Rashmi Abhay
तुम्हारे इर्द-गिर्द रोज एक नया संसार रचना और खुद हीं उसमें ढल जाना कितनी सहजता से स्वीकारती आई हूँ मैं तुम्हारे हर बंधन को बिना किसी क़ैद का एहसास लिए मेरी हर मौन को तुमने मेरी स्वीकृति समझा क्या कभी पूछा मुझसे कि मेरी क्या इच्छाएँ हैं?
मेरी आँखों में अपने मतलब की भाषा ढूंढ हीं लेते हो तुम... मगर कभी नहीं ढूंढ पाये मेरे अधूरे सपनों को जो सदा पलते रहें इन्हीं आँखों में.... जानती हूँ तुम्हारे प्यार को जो अपरिमित है... जिसमें खींची हैं मैंने अपनी छोटी सी दुनियाँ की कई लकीरें... जी लेती हूँ मैं प्यार के कुछ अनमोल लम्हों को जो ना जाने कब दिल से उतर कर सिर्फ जिस्म तक सिमट कर रह गया है उफ़्फ़...कितनी पागल हूँ मैं क्या औरत से भी कोई प्यार करता है भला ? हाँ...इश्क़ किया जाता है उससे वो भी अपनी मर्ज़ी से।
By Rashmi Abhay

Comments