स्वावलंबन
By Achla Sharma
एक दिन एक बेल ने ,
पौधे से बहस कर डाली ।
कौन मजबूत है कितना ,
कौन करें खुद रखवाली।।
बेल बोली देख मुझे,
मैं नाजुक कहां पर चढ़ी।
खुद ही मंजिल ढूंढी मैंने,
खुद उस पर मैं बढ़ी।।
चंद दिन में मैं फली,
फूल संग ले मैं खिली।
ऊंचाइयों को मैं चूमती,
अपनी धुन में मैं घूमती।।
छोटी उम्र मुकाम है भारी,
हर जगह बाज़ी दे मारी।
तुम वक्त के आगे अधीन हो,
मेरे सामने तुम क्षीण हो।।
देखा पौधे ने बेल का अहंकार,
छोड़ दिए शब्दों के तीर अपार।
सुन बेल तू भी मेरी इक बात,
स्वावलंबी हूं, ना चाहूं कोई साथ।।
मैं स्वयं के परिश्रम से,
आज खड़ा पौधा बने।
मेरा अस्तित्व जमीं के बीच में,
आकाश में मेरी तरंगे।।
तूफानों से हर पल मैं लड़ा,
कड़कती धूप में आगे बढ़ा।
संघर्ष की जिंदगी बिता,
आज पेड़ बन समक्ष खड़ा।।
तूने आज तक सहारा है लिया,
अपने बल तूने क्या किया।
शोहरत की भले ऊंचाइयां चढ जाएगी,
मैं वृक्ष, पर तू बेल ही कह लाएगी।।
By Achla Sharma

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