स्वयंवर
By Arpita Yadav
युग है छूटे, प्रण भी टूटे
पर मंद-मर्यादा न जाएगी,
कह दो जनक से , स्थिर रहें सबसे
अब सीता ना स्वयंवर रचाएगी।
पुत्री बनकर थक गई सीते,
पत्नी बनकर धँस गई सीते,
वनवास पूर्ण तो बस राम का हुआ,
मिथ्या भी हँसते-हँस गई सीते।
जागो जानकी , बंधन तोड़ो,
बंधु , अयोध्या सब तुम छोड़ो।
अग्नि परीक्षा सर्वथा नारी की,
धरती तो फट ही जाएगी,
कुटिया से निकलो, भार संभालो
अब जानकी न धरा में समाएगी।
अचल हो तुम ,
अटल हो तुम,
जीवन का मूल सतत् सकल हो तुम,
धनुष उठाओ, तीर लगाओ,
अबकी दृश्य एक विकल हो तुम।
निरुद्देश्य लगायें तुम पर ग्लानि,
होती रही बस तुम्हारी हानि।
बहुत हो गई निर्मम हत्या,
अब न सती सह पाएगी,
आओ सती , तुम खुलकर बोलो,
अब न देह कुंड में जायेगी।
कह दो दक्ष से ,
स्थिर रहें सबसे
अब सती न स्वयंवर रचाएगी ।
By Arpita Yadav

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Wonderful poem 👏 👏
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Amazing
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