स्वतंत्रता दिवस
By Mrs Paramjeet Kaur Jagir Singh Thuain
१५ अगस्त १९४७ को हुआ देश स्वतंत्र,
प्रति वर्ष हम मनाते स्वतंत्रता दिवस।
इस दिन यत्र-तत्र-सर्वत्र जब देखा हमने…..
तो प्रश्न उठा इक मन में,
यह कैसा स्वतंत्रता दिवस ?
मनाते हैं हम क्यों और किसलिए?
फिर यह कैसी स्वतंत्रता?
भाषा,सँस्कृति ,अस्मिता आज भी कैद हैं,
उसी पच्छम की ।
अरे भाई हम स्वतंत्र हैं न-
शरद पूनम , कोजागिरि न सही,
वैलेंनटाइन डे, फ्रैंड्स डे तो मनाते हैं।
रोज डाके पडते हैं, गली-गलियारे लूटे जाते हैं,
भ्रष्टाचार पनपते हैं, सरेआम अस्मतें नीलाम होती हैं।
कोई बंधन नहीं, कोई डर नहीं।
सब Free,यही है Freedom !!!
वाह क्या बात है स्वतंत्रता की?
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है?”
कहते-कहते जो पगला बिस्मिल शहीद हो गया,
उसका परिवार दिल्ली की सडकों पर घुटनों के बल,
भीख माँगने को स्वतंत्र है।
फिर देखो उस तरफ………
१०-१५ मिनिट का कैदी उस समय का,
आज जागीरें और अच्छी पेंशन पाने को स्वतंत्र है।
स्वतंत्रता की एक और बानगी…….
जिन अँग्रेजों और जिस अँग्रेजी से ,
निजात पाने को कितने मर मिटे,
आज हमारे बच्चे उसी अँग्रेजियत को,
ओढने और अँग्रेजी पढने को मजबूर हैं।
क्या करें? हिन्दी-मराठी विदेशी हैं,
जिसमें न स्कोप है और न इज्जत है।
अँग्रेजी पढने और पढाने वालों के लिए,
Red carpet बिछाए जाते हैं ।
अरे क्या कहा आपने? बडा नकारात्मक,
निराशाजनक दृष्टिकोण है आपका !!
क्या करें ?
जरा कारगिल शहीदों के घरों में झाँको,
ईमानदार ,देशभक्त, प्रज्ञावानों को तो आँको..
भ्रष्टाचारियों की ताजपोशी के जश्न को और
फिर दर-दर भटकते युवकों, खुदकुशी
करते किसानों को तो ताको…….
वे स्वयम् चारों ओर, और आज ही के दिन,
हँसते हुए फूलों और फहराती हुई झंडियों-झंडों
इंन्द्रधनुषी रंगों में डूबी हुई राहों को
देख कहेंगे…….
हम दें भी तो क्या दें तुम्हें
ऐ खुशनुमा शोख नजारो……
ले दे के हमारे पास कुछ आँसू हैं,
और कुछ आहें।
By Mrs Paramjeet Kaur Jagir Singh Thuain

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