“स्मृतियों की महक”
By Parul Bhargava
स्मृतियों की अँजुरी में
जब कभी
समेटती हूँ
श्वेत-श्यामल पलों को.....
जाने कितने
रंगों में
बिखरने लगते हैं
तेरे ख़याल...
और
मेरे मन के किसी कोरे
कैनवास पर
एकाकार हो
जीवंत हो उठते हैं....
तभी मेरा
बेनूर चेहरा
इन्द्रधनुषी आभा सा
दमक सा उठता है ....
सोचती हूँ
कैसा अलौकिक है
तुम्हें अपने में सहेजना
समीप ना होकर भी
अक्सर तुम मेरे
ख़यालों में महकते हो ॥
By Parul Bhargava

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