स्त्री तेरी कहानी , (औरत)
Updated: Aug 21, 2025
By Dr. Neha Singh
ना कर तु जुल्म समझकर कमज़ोर मुझें,
है क्या पता नहीं ताक़त मेरी तुझें ।
क्या जानता नहीं काली रूप को तू ;
जो करे आत्याचार राक्षस् के रूप में तू ।
है उदार हृदय ,कोमल सा मन है
मान रखाकर लक्ष्मी समान तू
है जिसे नकारता चारों तरफ़ से तू
है उसी ने जन्म दिया तुझे भी ।
हूँ समाज़ का आधार मैं ,
हूँ समाज़ का उद्धार मैं ,
हूँ श्रीष्टि का आरंभ मैं ,
हूँ श्रीष्टि का अंत भी मैं !
समझता है कमज़ोर मुझे तू
हूँ शिव की शक्ति भी मैं !
है ! क्या तेरी शख़्सियत मेरे बग़ैर
स्वयं शिव भी शव हैं शक्ति के बग़ैर !
काली मैं , लक्ष्मी मैं और सरस्वती भी मैं तो क्यों करता फिरता है इतना अभिमान तू ।
धिक्कार उस समाज़ पर जो स्त्री की मर्यादा को ना समझे !
समाज़ में जो आत्याचारीं हैं ;
उन पर तो केवल “काली “स्वयं ही भारी हैं ।
जीतने भी समाज में रक्तबीज उगेंगे
उतनी बार माँ चामुंडा रूप भी लेंगी
फिर करता है तू घमंड क्यों !
हूँ लक्ष्मी रूप में मैं , हूँ काली रूप में भी मैं ही ।
मोम भी हूँ और महासंघार भी मैं
पर जो छुए मेरे स्वाभिमान् को कोई
तो सबसे बड़ी चिंगारी भी मैं !
बेटी से बहू बनने का सफ़र
सजा के रखे थे ख़्वाब जो ,
कर चाकना चुर सजा दिये वही थाल में जो
तूने !
पूछ रहा मेरा अंतर्मन्न क्या किया था ऐसा गुनाह जो !
तेरी इज़्ज़त ,मेरी इज़्ज़त रखे सँभालें आज भी जो ;
क्यों उससे बिखेरता यूँ कचरों के संघ , बने शरीफ फिर भी आज तू !
मान रख ,अभिमान कर मिल आई मैं सौग़ात में ;
कर धन्य तुझे तेरे बंश को , हो रही हो अब बिदा ,अब यहाँ से जाना है !
By Dr. Neha Singh

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