स्त्रियाँ
By Rashmi Abhay
स्त्रियाँ बांध लेती हैं हर परेशानी को अपने आँचल के छोर पर और कस कर खोंस लेती हैं उसे अपने कमर में एहितयात बरतती हैं कि भूले से भी खुल ना पाये वो गांठ और कोई आंच ना आ पाये उसके परिवार पर स्त्रियाँ उठा कर रख देती हैं हर दर्द को कमरे के सबसे ऊंचे ताखे पर और चुपके से ढंक देती हैं उसे घर में पड़ी मौनी से.. तसल्ली कर लेती हैं उसे एक बार उठा कर कि वहाँ तक सिवा उनके किसी और की नज़र तो नही जाती
स्त्रियाँ चुपके से खा लेती हैं आधी रोटी सुखी हुई आचार से और भर के पी लेती हैं पानी ताकि आ सके डकार... भरे हुए पेट की तरह कभी किसी से कोई.. शिकायत नही होती बस चाहती हैं थोड़ा सा मान-सम्मान जिसके बदले में आहूत कर देती हैं अपना पूरा जीवन एक मकान को घर बनाने में जो कभी उसका अपना नही हो पाता
स्त्रियाँ बचपन से सुनती आती हैं तुम लाज हो दो कुलों की और दे देती हैं अपनी पूरी ज़िन्दगी उस लाज को निभाने में.. मूक सी देखती रहती हैं अपनी जड़ से उखाड़ कर कहीं और रोप देने तक के सफर को.. मगर कभी कह नही पाती किसी को कि वो खिली की मुरझाईं अंततः स्त्रीयाँ बन जाती हैं चौखट उस मकान की जिसे घर बनाने की प्रक्रिया में अपना पूरा जीवन दे डाला और सहती रहती हैं चुपचाप हर आने जाने वालो की ठोकरों को फिर भी नही कहती अपनी तकलीफ़ किसी से भी और बड़ी सजगता से बंद कर देती हैं कपाट उस घर की अगर सामने से नज़र आ जाती है कोई भी विपदा आती हुई।
By Rashmi Abhay

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