सैनिक का एकालप
Updated: Jan 27, 2024
By Yogesh Kumar Pradhan
में भय से नाता तोड चला,
झंझावात का रुख मोड़ चला,
आराम,सहजता छोड़ चला,
में चला समर की ओर चला।।
अब के जो रण में जाऊंगा,
किंचित ही लौट के आऊंगा।
दिख रहा समर में घोर काल,
कर धरे अंत का प्रखर भाल।
पर हिय न तनिक अकुलाता है,
संग मेरे जगत का त्राता है।
मैं बांध कफ़न सर निकला था,
भय, खौफ़ त्याग कर निकला था।
अब काल भेद घर जाऊंगा,
या बलिदानी बन तर जाऊंगा,
मैत्री का कर्ज़ चुकाना है,
ममता का फ़र्ज़ निभाना है।
छाती पर लूंगा वार सभी,
रण से न रहूंगा विमुख कभी,
मैं समर वक्ष गरजाऊंगा
प्रण है हर मोल चुकाऊंगा।
हो जाए अंत का संखनाथ,
शोणित से रंग जाए ये हाथ,
मैं नहीं फिरूंगा अब रण से,
अवरोध होगा केवल मरण से,
विजय पताका फहराऊंगा,
या लिपट तिरंगा आऊंगा।
By Yogesh Kumar Pradhan

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