सैंतालीस
By Kristy Saikia
(It is a poem about the ‘1947 India-Pakistan separation’. This narrates the tale of two young boys who were torn apart from one-another forever.)
दो मासूम हसीन जाने
एक कमबख्त अंजान घड़ी
से बेखबर,
सैंतालीस नामक एक शाजिशों
से भरे घाटी में
एक अनसुनी और अनकही गूंज
बनकर रह गए।
नन्ही मुस्काने,
दोपहर की हलचल धूप में
पिघल गई
और वह सैंतालीस नामक फैसला
शाम ए ग़म की रागिनी में
एक अप्रिय स्वर
छोड़ चली गई।
अनदेखी सुबह थी वह,
एक अनहोनी सी रेल थी
उसके अंजान से धुएं में
धुंधले हो गए
सारे मंत्र और आयत का मेल,
और जाते-जाते
लिख गई उन नन्हे बेगुनाह दिलों
के पन्नों पर
हिंदू मुसलमान का भेद।
कई अरसों बीत गए
लेकिन आज भी
सरहद के इस पार के
वह कांपते हाथ,
कलम की नोक से
प्रिय दोस्त लिखकर
रुक गए।
पता?
रावलपिंडी? लाहौर? कराची?
या फिर अपना ही परदेस?
By Kristy Saikia

Good one
Good
This poem has my whole heart❤️
Absolutely wonderful
touched