सूरज और चांद
By Dhruv Soni
सूरज भी चांद से,
उसकी चांदनी छीन लेता है ।
अपनी चमक से फिर उसे भी,
लौटने पर मजबूर कर लेता है ।।
चांद फिर बेबस,
और लाचार होकर,
अपनी चमक को कोसता है ।
और वहा सूरज,
चांदनी को छोड़,
अपनी रोशनी खोजता है ।।
सूरज की बस्ती में फिर,
रोशनी का बसेरा होता है ।
तब जाकर कहीं,
इंसानों का सबेरा होता है ।।
रोशनी फिर शाम को,
सूरज का हाथ छोड़ती है ।
तब सूरज की भी,
चांद सी हालत होती है ।।
रोशनी को खोते हुए सूरज,
अंधेरे को,
इंसानों के हवाले करता है ।
फिर चांद आता है,
और वापिस,
उस अंधेरे को उजागर करता है ।।
ऐसे ही तो जनाब,
धरती पर,
दिन और रात का वकत होता है ।
कोई दुनिया जीत कर रोता,
तो कोई सब कुछ गवाकर सोता है ।।
इसी का नाम जनाब,
जिंदगी होता है ।
यहां फल उसी को मिलता,
जो अपना बीज बोता है ।।
By Dhruv Soni

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