सूखा पत्ता
By Sanket S. Tripathi
मैं वो सूखा पत्ता हूँ जो ,
टहनी से तो टूट गया ,
जो मुझको पोषित करती थी ,
उससे नाता छूट गया ।
पर धरती पर पड़े पड़े मैं ,
एक टक देखूं झाडी को ,
जो हमको बाँधे रखती थी ,
अब वह बंधन टूट गया ।
पहले टहनी थी हरी भरी ,
मैं भी था हरा भरा एक पात ,
था ग़ुमान जो बीच हमारे ,
ऐसी होगी किसमे बात ।
हवाएँ चलती थी जब भी ,
वह मुझे झुलाया करती थी ,
अपने हिस्से की भी ऊर्जा ,
वह मुझमे ही ला भरती थी ।
पर कुछ बदला पहले तुझमे ,
फिर बदला वह मुझमे भी ,
आए कुछ ऐब तुम्हारे अंदर ,
फिर आए वह मुझमे भी ।
थी कौन घड़ी ईश्वर जाने ,
एक नई कली तुझसे फूटी ,
रिश्तों के नाज़ुक कंचन भू पर ,
नियति मानो हमसे रूठी ।
जो शाम बीतता था मुझ संग ,
वो शाम कली के नाम हुआ ,
टहनी के ही संग रह भी ,
जाने कब मैं घुमनाम हुआ ।
गर समय रहा कुछ शेष यदि ,
बस उतना हिस्से आता था ,
सूखा तन भी मन भी सूखा ,
जो कभी किसी उपवन सा था ।
तूने मुझको गिरा दिया या ,
तिरस्कार ने तेरे ठेल दिया ,
कोई खेल सके ना ऐसा ,
जीवन ने मुझ संग खेल किया ।
गिरते गिरते अब मैं देखूँ ,
हरी भरी उस झाडी़ को ,
जैसे देखे गिरता झरना ,
ऐंठे हुए पहाडी़ को ।
क्या बदला था, क्या बदला था ,
यह सोच सोच मैं बिखर रहा ,
आया अनिल कहा कुछ मुझसे ,
मैं तुरत माजरा समझ गया ।
था बदला जो मुझमें, तुझमें ,
सृष्टि का संतुलन संभल गया ,
इसमें ना कोई दोषी था ,
रिश्तो का मौसम बदल गया ।
इसमें ना कोई दोषी था ,
रिश्तो का मौसम बदल गया ।
By Sanket S. Tripathi

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