सुरक्षा कवच
By Disha Kedia Gupta
वह रोज़ पिट कर आती है,
मुझसे अपना ज़ख़्म छिपाती है !
दर्द अपना ख़ुद ही पी जाती है!
पूछने पर-गिर गई थी बीबीजी ,
कह कर हँस देती है !
पर उसकी सूंनी बेबस आँखें सब कह ज़ाती हैं!
और उसका पति
ना तो काम पर जाता है,
ना ही कुछ कमाता है !
घर भी यही चलाती है और मार भी खाती है !
एक दिन
कहा मैंने, छोड़ क्यूँ नहीं देती उसे ?
उत्तर मिला, कैसे छोड़ दूँ बीबीजी ?
ये मंगलसूत्र ,ये माँग का सिंदूर, ये माथे की बिंदिया ,
सब उसी से तो है !
ये सब मेरी ढाल है, नहीं तो आपको पता ही है,
समाज का क्या हाल है!
लुट जाऊँगी या लूट ली जाऊँगी ।
ये हमारा समाज ,
कुँवारी, विधवा, परित्यकता अकेली औरत को,
जीने कहाँ देता है?
कैसे छोड़ दूँ?
और हम ही क्या बीबीजी,
आपके पढ़े लिखे सभ्य समाज में,
देखा है मैंने।
औरत को सब कुछ सहते हुए।
पर फिर भी चुप रहते हुए।
कहाँ छोड़ पाती हो आप भी इस ढाल को?
इस बिंदिया सिंदूर मंगलसूत्र को?
बीबीजी ये हमारा सुरक्षा कवच है।
बस इसीलिए हम इन्हें ढोते है,
इनकी शर्तों पर,
बिना शिकवा शिकायत के जीते है।
अब एक प्रश्न आप सबसे!!
क्या वास्तव में स्त्रियाँ इन सुरक्षा कवचों के बिना असुरक्षित है?
ये ढाल स्त्रियों के लिए अनिवार्य है??
ख़ुद औरत सक्षम नही है अपनी रक्षा के लिए??
पिता, भाई के बाद पति और फिर बुढ़ापे में बेटा !
इनके बीना उसका जीवन सम्भव है या नही!!
By Disha Kedia Gupta

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