“सुनो ! क्या तुम मुझे चाहते हो ?”
Updated: Oct 4, 2024
By Iba Mahin
सुनो ! क्या तुम मुझे चाहते हो?
ये बात, वक़्त-बेवख़्त तुम जताते हो ,
मगर वो जज़्बात तुम्हारी आँखें क्यों नहीं कहती ,
जो तुम लबों से सुनाते हो ।
मैंने अक्सर देखा है तुम्हें,
निहारते हुए हसीन चेहरों को,
कितने ग़ौर से सुनते हो तुम,
बातें ग़ैरों की , उनकी बातों पे ,
तो तुम खिलखिलाके मुसकाते हो।
पर ज्यों ही तवज्जों देनी हो मुझे,
तुम गहरी सोच में गुम हो जाते हो ।
मानो मेरा वजूद हो बेमाईंने तुम्हारे लिए ,
जैसे टूटा एक खिलौना कोने में पड़ा ,
जिसे पाने के बाद ,
एक ज़िद्दी बच्चे का मन भर गया ।
तुम्हारे तंज़ भरे जुमलें सुनकर ,
मैं अक्सर ही चुप हो जाती हूँ,
फिर घंटों आईने के सामने ,
अपने ही वजूद की कमियाँ निकालती हूँ ।
क्योंकि मैं जानती हूँ ,
की तुम भी मुझे चाहते हो ,
मन ही मन मेरा तसव्वुर कर ,
मुस्कुराते हो।
लेकिन फिर क्यों ऐसा लगता है ,
मानो मैं ख़ुद से कुछ छुपा रही हूँ ,
हसीन ख़्वाब के ख़याल से ,
सच से दूर जा रही हूँ ।
तुम्हें ख़ोने का एहसास,
अक्सर बेचैन कर देता है मुझे,
लेकिन क्या तुम मेरे साथ होकर भी ,
मेरे पास रह पाते हो ?
सुनो! क्या तुम सचमे मुझे चाहते हो ?
मैं अब अक्सर खोयी हुई रहती हूँ ,
मानो निकल पड़ी हूँ ख़याली रास्तों पे ,
और भटक गई हूँ सर्द रातों में ,
जैसे ढूँढ रही हूँ जवाब ख़ुद के ही सवालों का,
और डूब रही हूँ उलझे जज़्बातों में।
तुम्हारा साथ, क्यों लगता है छलावे की तरह ,
की एक पल में एहसास का दरियाँ हो जैसे ,
और अगले ही पल एक कतरा भी नहीं।
मानो भीग रहीं हूँ ठंडी फुहारों में कभी ,
और कभी भटक रहीं हूँ बंजर रेगिस्तान में कहीं।
सुनो! क्या तुम मुझे चाहते हो ?
ये जो तुम “उस” की तसवीरें
किताबों में छिपातें हो,
और सवाल करने पे,
निगाहें चुराते हो,
खो जाते हो यूँ ही ख़यालों में ,
जैसे उलझे हो , अनकहें सवालों में,
क्या तुम “उसे” आज भी चाहते हो?
सुनो ! मैंने खो दिया है ख़ुद को ,
तुम्हें पाने की ज़िद में ,
आयना देंखूँ, तो अक्स नहीं दिखता ,
बल्कि नज़र आती है ,
एक टूटी हुई , बिखरी हुई , सी परछाई ,
जिससे छीन ली तुमने ख़ुशियाँ सारी ,
और उसने झूठी मुस्कान लबों पे है सजाई।
पर अब और नहीं लड़ सकती ख़ुद से ,
नहीं पूछ सकती रोज़ , हर पल,
एक ही सवाल ,
की क्या तुम मुझे चाहते हो ?
क्योंकि , मन ही मन ,
जवाब इसका मैं भी जानती हूँ ,
कुछ भी बोले बिना , सब समझती हूँ ,
की तुम्हारे मन मे बस्ती है आज भी वो ,
जिसकी बातें तुम मुझे घंटों सुनातें हो ।
और मिल ही गया मुझे उस अनसुलझे सवाल का जवाब ,
की तुम मुझे नहीं , आज भी “उसे” ही चाहते हो,
क्योंकि मोहब्बत जैसे नाज़ुक रिश्तों मे,
आप नहीं तोड़ते महबूब का दिल ,
ना ही भरीं महफ़िल में करके ज़लील ,
हल्के से कान में फुसफुसा देते हैं,
दो प्यार भरे बोल ,
क्योंकि, जिससे मोहब्बत करते हैं लोग ,
उसे देते हैं इज़्ज़त बेशुमार भी ।
कुछ लोगों को माहौल ऐसा मिलता है कि वो कआमोयाब होते हैं,
कुछ के हालात ऐसे होते है जिससे वो कमियाँ होते है
By Iba Mahin

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