सुनो... कुछ केहना है !
By Shivshankar Santosh Patwa
मेरी मुस्कान का राज़
मेरी नींदो की आवाज़
आँखों की नमी में छिपाया है
अब उन्हें बिखरना है
सुनो... तुमसे कुछ केहना है!
वो कुछ अधमरे से हालात थे,
काँटों सी चुभती थी साँसें।
कठोर दिल भी थकने लगा था,
उलझनें लगी थी सब बाँतें।
तब एक अजनबी आवाज़ में; दिल ने खुशी ढूंँढ ली
शायद जो धुन गुन-गुनाती थी तुम, मेरी ज़रूरत थी।
धीरे-धीरे मन खोने लगा, एहसाँसों के घेरे मे
सेहमा–सेहमा ढूँढा तुमको, मेरी शामों सवेरों में।
जानता हूँ; इन बाँतों से तुम्हें बड़ा इंकार
फिर भी, सुनो... केहना है तुमसे...
हुआ है ऐसा पेहली बार।
जानता हूं
जिन आँखों को देख मैं इतना चमकता हूँ
वो मेरे लिए नहीं चमकती,
तुम्हारी खुशबू मेरे लिए नहीं दमकती
तुम्हारे लबों पे ठेहरे वैसा मेरा नाम नहीं
मगर फिर भी
सुनो... ये केहना है तुमसे...
तुम्हें बेवजह अपना मानता हूँ मैं।
तुम्हारे रूठने में, तुम्हे मनाने में,
तुम्हारे शरमाने में, तुम्हें सताने में,
तुम्हारे आँसू बहाने में, नम आँखें छिपाने में,
तुम्हारे नाक सिकोड़ने में, और मुस्कुराने में,
क्या चाहिए तुमको,
मुझे लगता है, जानता हूं मैं।
तुम्हारी आँखें पढ़कर, नाहक कभी कहा नहीं
इजाज़त दो तो अभी, सारा किस्सा केह दूं मैं।
सुनो... थोड़ा जानकर पेहचानना है तुम्हें
जो तुमने कहा नहीं, उसे समझना है।
अगर मानो; तुम्हारी हँसी में मुझको रेहना है।
न मानो तो भी खुश रहना; बस इतना केहना है।
सुनो... अच्छा जाने दो
जो भी अनकहा सा है,
अगर समझना है; तुम्हें समझना है।
मेरे मन को बस इन यादों कि गुनजन के साथ रेहना है
तुम कुछ कहो... हमेशा मुझसे कुछ केहती रहो
बस इतना केहना है
बस... इतना ही केहना है!
By Shivshankar Santosh Patwa

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