सुनिए अगर तोह!
By Prathamesh Samant
सुनिए अगर तोह,
कुछ कहने की ख्वाइश है...
जरा देखिये अगर तोह,
सर-ए-आम ख्यालों की नुमाइश है...
ना धुन कोई,
ना कोई शायराना अंजाद है,
ना लिहाज़ का पर्दा कोई,
ना गहरा कोई राज़ है...
कुछ खट्टे-मीठे किस्से,
लिफाफों में रखें हैं...
कुछ अनदेखे-धुन्धाले से सपने ,
पन्नो के बीच दबाए रखे हैं...
सुनिए अगर तोह,
कुछ ख़त पढवाते हैं...
जरा देखिये अगर तोह,
ख़्वाबों के सिलसिलें चल्वातें हैं...
ना बंदिश कोई,
ना कोई अल्फाजों की गर्दिश है...
ना सलाह-मश्वराह कोई,
ना सवाल-जवाबों की गुंजाइश है...
सुनिए अगर तोह,
कुछ कहने की ख्वाइश है...
जरा देखिये अगर तोह,
सर-ए-आम ख्यालों की नुमाइश है.
By Prathamesh Samant

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