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सीता की गाथा

Oct 11, 2025
3 min read

By Prachi


देखो नारायण अवतार लिए

संग चली लक्ष्मी माता,

रघुकुल में है जन्मे विष्णु

दशरथ ने उनको राम कहा,

धरती की गोद से निकली मैया 

जनक ने उनको सीता नाम दिया।


वह छोटी थी अलौकिक थी,

अपने छोटे हाथों से शिव का धनुष उठा डाला, 

राजा जनक ने अपना भी प्रण घोषित कर डाला-

जो शिव का धनुष उठाएगा,

उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा,

वही सीता का वर कहलाएगा। 

समय ने चक्र घुमाया है 

लक्ष्मी नारायण के मिलन का समय निकट अब आया है।

नगर में है स्वयंवर की धूम चली,

सीता देवी वंदना करने उपवन की ओर चली, 

वहां प्रकट रघुकुल शिरोमणि राम, 

तेजस्वी रूप विनय का धाम।

नैन मिले जब दोनों के तब उपवन हर्षाया था

मैया ने कुलदेवी से राम को वर के रूप में पाया था।

जब कोई धनुष हिला न पाया था,

जनक ने निराशा से इस धरती को जब वीर हीन बताया था,

तब गुरुवार की आज्ञा से राम ने धनुष उठाया था 

धनुष भंग हुआ मगर सीता ने राम को पाया था। 

अयोध्या नगरी में बजे मंगल गान, 

बजते वीणा मृदंग विधान।

जन-जन के मन में उमंग उठी,

सुनी राम तिलक की शुभ गाथा कही।


तब आई विधि की विचित्र चाल, 

मंत्र बोले विषम कुटिल बोल,

कैकई मन में विकार भरा,

सिंहासन का मार्ग अंधकार घिरा।


वन गमन का जब समय आया,

अयोध्या का हृदय भर आया। 

राम मौन थे लक्ष्मण उदास,

सीता का बोला दृढ़ विश्वास,

जहां आप है वही है मेरा धाम, 

महल हो, वन हो सदा संग हो राम। 


काली घटा है गिर आई,

स्वर्ण मृग की माया छाई,

राम उसे वन में लेने जाई।

लक्ष्मण रेखा सीता पास, 

रावण आया बना भेष मैया के पास,

सीता हरी लंका को लाई,

अशोक वाटिका में बैठाई।

 

राम जी ढूंढे सिया को होके उदास, 

हनुमत बने आशा विश्वास, 

हनुमान गए सागर को लांघ, 

लंका में सीता ली पहचान ।


वानर संग राम चले रण में, 

गूंज उठी रणभूमि क्षण में, 

प्रचंड बाण जब छोड़ें राम, 

चारों ओर हि त्राहिमाम।


सीता का गौरव पुनः मिला,

धर्म का अंत धरा पर हुआ,

सीता संग जब लौटे राम,

गुंजा अयोध्या में शुभ गान,

सिंहासन पर बैठे श्री राम।


रामराज में सुख भतेरे, फिर भी उठे प्रश्न घनेरे। 

ब्रह्मांड ने यह कैसा ताना मारा है- 

लक्ष्मी पर फूल चढ़ाने वालों ने

सीता के चरित्र पर पत्थर मारा है। 

जिसने पाप का दामन थामा है, 

उसने सीता को अपवित्र माना है। 

वह चाहती तो लड़ सकती थी, 

वह न्याय स्वयं कर सकती थी, 

पर वह तो जग की माता है, 

राज धर्म बचाने हेतु उसने अपना सब कुछ त्यागा है। 

कब तक रहेगा मन उदास, कब खत्म होगा सीता का वनवास?

वन गमन करते हुए पहुंची वाल्मिकी धाम में, 

परंतु यह कैसी मर्यादा निभाई है मर्यादित राम ने, 

राज सिंहासन की लौ बचाई, 

सीता के आंसू से अयोध्या भर आई, 

मर्यादा का बोझ उठाया, 

पर प्रिया का हृदय दुखाया, 

राज बचा पर मन खो गया 

सीता बिना जीवन रो गया। 


फिर वाल्मिकी धाम में खुशियों के फूल खिले, 

राजवंश के दीप जले। 

लव कुश अमर गाथा कहे। 

वाल्मीकि ने दिया ज्ञान महान, 

धर्म नीति साहस का ज्ञान।


नागरी में जब लव कुश जब गान सुनाएं 

राम कथा के छंद गाए,

हर शब्द में सीता की पीड़ा, 

त्याग तपस्या जीवन की क्रीडा। 

स्वर थमा तो बोले बालक, 

मां सीता ही हमरी पालक,

हे श्री राम!

तुम ही हो हमारे पिता महान।

सभा में गूंज उठे थे स्वर,

सीता को बुलाओ करो साक्ष्य प्रखर। 


राम कहे सीता मैया से-

सीता प्रमाण तुम्हें देना होगा,

जन मानस का संदेह हरना होगा।


करुण स्वरों में बोली माता, 

यदि आज भी मुझ पर संदेह रहे, 

तो जीवन से बढ़कर क्या सत्य कहे।

तब मां ने अपनी जननी को पुकारा है, 

यदि शुद्ध रही हूं मैं,

तो मां अपनी गोद में समा ले मुझे, 

मां अपने साथ ले चल मुझे,

जहां मेरा सम्मान नहीं,

वहां मेरा स्थान नहीं।


धरती की गोद में समा गई है, 

पीड़ा का सागर छोड़ चली।

 

अब क्यों तुम अश्रु बहाते हो,

अब चाहे तो रहे ये जग उदास 

पर अब खत्म हुआ लक्ष्मी का वनवास।।


By Prachi


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Krishna Kumar
Krishna Kumar
Dec 14, 2025
Rated 5 out of 5 stars.

Best

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Vani
Vani
Dec 14, 2025
Rated 5 out of 5 stars.

👏 💖❤️❤️

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Deepak Kumar
Deepak Kumar
Dec 14, 2025
Rated 5 out of 5 stars.

excellent

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Djbravo Potter
Djbravo Potter
Nov 30, 2025
Rated 5 out of 5 stars.

Kya likhti h yarr tu🤩😍

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Djbravo Potter
Djbravo Potter
Nov 30, 2025
Rated 5 out of 5 stars.

Very nice prachi kya likh ti h yarr

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