सारे जहाँ से अच्छा
By Chandra Kant Mishra
चलो एक बार फ़िर सवेरे-सवेरे
ज़िन्दगी की किताब के पन्ने फेर
ढूंढ़ लें छुपी खुशियों को
समेंट लें बिखरी तिनकों को
अभी भी हममें वो कशिश है बाकी
देखने वालों ने देखा है केवल झाँकी
साथ हमारा आम और आंटी की तरह
दिए में जैसे तेल और बाती की तरह
संग देख कर कह जाते हैं सारे
जमीं पर जैसे फ़लक के हैं दो सितारे
चाहे तो देख ले कोई चीर कर सीना
दिल में बसे हो तुम, और कोई ना
सुन कर जल जाते हैं कितने हबीब
जनता हूँ, कितना हूँ मैं तुम्हारे करीब
थक जाता हूँ जब, होकर तर-ब-तर
लेट जाता हूँ तेरी गोद में रख कर सर
भर लेती है तू मुझे अपनी आग़ोश में
चढ़ जाती है ख़ुमारी, रहता नहीं मैं होश में
खुशबू जो आए तेरे बदन से, तो ऐसा लगे सर्द रातों में भी कहीं गर्म बया चले तृप्त हो जाता हूँ पाकर कोमल स्पर्श तेरा चाहूँ, मैं उस पल, क्षीण-मद्धिम सा अँधेरा देखे तुझे तिरछी नज़र से, है किस में ये दम चीर दूँ सीना, कर दूँ उसका सर क़लम आए कोई दुशासन छूने तुम्हारी चीर को पार करना पड़ेगा उसे मेरी रक्त-रंजित शमशीर को जो पड़ आए कभी आन पर तेरी न्योछावर कर दूँ मैं जान भी मेरी सुन रहे हैं जो इस प्यार के बंधन को जनता हूँ उनके मन में चल रहे उलझन को उनकी सोंच से परे है तू और तेरी महिमा क्योंकि तू है मेरी सस्य श्यामल धरती माँ गूँजे हर तरफ़ बस एक ही नारा सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा।
By Chandra Kant Mishra

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