साया नहीं
By Sarthak Shankar Chaturvedi
मैं अपनी छाँव से हर रोज़ कट के चलता हूँ,
अगर ये धूप ही जीवन है, तो मैं साया नहीं हूँ।
हवा की शक्ल में इक ज़हर घुल रहा है अब,
अगर यही साँसें हैं, तो मैं ज़िंदा नहीं हूँ।
किसी मचान से दिन टपकते हैं, चुपचाप,
अगर यही सवेरा है, तो मैं ताज़ा नहीं हूँ।
मुझे हर रोज़ ही ख़ुद से सवाल करने हैं,
अगर यही शऊर है, तो मैं दानिशवर नहीं हूँ।
तमाम रंग हैं चश्मों में, पर नज़ारा नहीं,
अगर यही देखना है, तो मैं देखता नहीं हूँ।
मैं आईनों से भी अब अपना नाम माँगता हूँ,
अगर यही होना है, तो मैं चेहरा नहीं हूँ।
हर इक क़दम पे कोई मिल गया मगर बेजान,
अगर यही मिलना है, तो मैं पाया नहीं हूँ।
हँसी की ओट में आवाज़ काँपती सी लगी,
अगर यही ख़ुशी है, तो मैं हँसता नहीं हूँ।
गुलों की बात करें भी तो काँटे सुनते हैं,
अगर यही बयां है, तो मैं लफ़्ज़ भी नहीं हूँ।
जो कुछ नहीं भी रहा, वो भी बोझ लगता है,
अगर यही सुकूँ है, तो मैं हल्का नहीं हूँ।
‘साया’ हूँ सिर्फ़ उस दरख़्त का जो गिर गया था,
अगर यही जीना है, तो मैं 'सार्थक' नहीं हूँ।
By Sarthak Shankar Chaturvedi

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Amazing 👏
Beautiful yaar
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