साम्प्रदायिकता
By Budhraj Singh Khinchi
साम्प्रदायिकता घृणा के तवे पर सिकती राजनीति की रोटी है।
साम्प्रदायिकता मनुष्य बने कुछ कुत्तों के मुँह की बोटी है।
साम्प्रदायिकता मनुष्यता के अन्तःकरण में बोया हुआ विकार है।
साम्प्रदायिकता कुण्ठित मानसिकता का एक घिनोना विचार है।
साम्प्रदायिकता आज मानवता के उत्थान की राह में रोड़ा बने खड़ी है।
साम्प्रदायिकता आज सम्पूर्ण मानवता की शत्रु बने खड़ी है।
साम्प्रदायिकता लोगों के मन में बलात् बोया गया असुरक्षा का भाव है।
साम्प्रदायिकता मनुष्यता में प्रेम, करुणा और शान्ति के परमभाव का अभाव है।
साम्प्रदायिकता ऐसा नहीं है कि सिर्फ़ विवेकहीन लोगों का वैचारिक विवाद है।
साम्प्रदायिकता दंगों जैसे पैशाचिक कृत्य के लिए प्रायोजित घृणित उन्माद है।
साम्प्रदायिकता ऐसा नहीं है कि विभिन्न सम्प्रदायों में फैलाए गए अस्तित्व के संकट का प्रतिवाद है।
साम्प्रदायिकता आज के दौर में नासूर बन चुके घृणा के ज़ख्म से मानवता के पुरे ज़िस्म में फैलता मवाद है।
साम्प्रदायिकता इसलिए आज के दौर की समस्या बहुत बड़ी है।
क्योंकि साम्प्रदायिकता आज धर्मनिरपेक्षता का चोला ओढ़े खड़ी है।
साम्प्रदायिकता का ईश्वर, अल्लाह, गॉड, रब, भगवान, ख़ुदा उसे जो भी कहकर पुकारते हो इसका उससे कोई सरोकार नहीं है।
अगर देख पाओ तो देखो अक़्ल के अंधों क्या साम्प्रदायिकता शैतान का तुम्हारे ही वज़ूद को ख़त्म करने का हथियार नहीं है।
By Budhraj Singh Khinchi

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