साँवली
By Arpita Yadav
पाबंदियाँ खुद पर इतनी भी न लगाया करो,
अल्हड़ दोपहरी में भी ज़रा निकल आया करो।
ये,घर से मंदिर और मंदिर से घर तक के सफर की कैसी रीत है,
कभी-कभी खुदा के अलावा भी किसी को दीदार कराया करो।
और शामों से तो कोई पक्की-शर्त है,
अरे, संध्या सहेली के अलावा भी किसी बुलावे पर जाया करो।
और इतना क्या अस्त-व्यस्त और मग्न रहती हो,
कभी न दिखुँ मैं तो थोड़ी बेचैन हो जाया करो।
सवेरा आँखों में चमकता है,
और संध्या पांव में थिरकती है,
सकुचाती-सकुचाती चले जब वो नारी,
तो रातें भी खुद ही लपकती हैं।
कई वर्षों से सवाल पूछते थक गए हैं ये तारे,
की चाँद भी यहाँ,सूर्य भी यहाँ, सबरी पुरवाइयां छोड़,
क्यों बस तू उस एक की नज़र उतारे।
ये कृष्ण-गगन का राजा चाँद,
बड़ी जल्दी जल जाता है,
जब तुम्हारी भूरी आंखों का खुमार मुझपे,
उसके पहर से ज्यादा चल जाता है।
रात की पूछताछ के बाद,
सवेरा भी मुझसे मिलने आता है,
है रोशनी मेरे अंदर इतनी,
कहकर बड़ा इठलाता है।
उसके इठलाने पर मैं तेरे ख़्वाबों से उठता हूँ,
उठता हूँ तो फिर मैं उसकी भी सुनवाई सुनता हूं।
वैसे, मुझे अच्छा नहीं लगता,
हर आए हुए को नाराज़ कर देना,
घमंड तोड़ने के लिए तेरा पता देकर,
तेरा हमराज़ कर देना।
वो मुझसे मिलने आते हैं या सिर्फ तेरा पता पाने का बहाना था,
सोच रहा हूँ मैं ऐसे ,
क्योंकि मुझे भी तो एक दिन तेरी गली आना था।
लड़ते झगड़ते फिर दोपहर भी आ जाती है,
चंचलता में बस मेरे ही पैर जलाती है,
मैं भी ज़िद में बैठ जाता हूँ गर्म रेत पर,
आती है वो मनाने मुझे, फिर मेरे ही बगल लेट जाती है।
फिर हम दोनों करते हैं बातें तुम्हारी,
किस तरह तुम दूर हो क्षितिज से भी हमारी।
पसंद तो हम दोनों ,किसी को भी नहीं।
कोई नहीं निकलता, हमारे लिये कहीं।
तुम्हें भी फुर्सत कहां की ज़रा ऊपर-नीचे देखो,
हल्की दोपहरी में निकलकर,
ज़रा साँवले बदन को सेंको।
और जब अत्यंत निठल्ली बैठी हो मोहतरमा आप,
तब इन भूरे-नैनों के पारदर्शी-पर्दों को ज़रा नीचे झुकाकर,
देखना अपनी एड़ियों में लगी धूल को सहलाकर,
कितनी बेरहमी से रगड़कर अलग किया जाता है,
अरे! इतनी कोशिशों के बाद पहुंचे राही संग,
थोड़ा तो सब्र किया जाता है।
By Arpita Yadav

❤️
That poem is truly exceptional.
🤍🤍
👏❤️
Really such a amazing poem, well done 👍🙃