सहमा सा है मेरा देश...
By Rishabh Jain
सहमा सा है मेरा देश,
कुछ समझ न आये क्या करें ,
बंद घरों के कोनों मैं छुपके
हैं सिर्फ खिड़की से झाँक रहे
आज सहमा सा है मेरा देश...
कब छटेगी यह धुंध,
और मैं फिर से उड़ सकूंगा
लंगड़ा सा हो गया हूँ मैं,
पता नहीं कब फिर से दौड़ सकूंगा
एक अजीब सी बेचैनी है आज कल,
पता नहीं क्या होगा कल परसों,
क्या इसी दिन के लिए जोड़ रहा था मैं,
मेहनत कर एक-एक पाई बरसों?
यह सही नहीं की मैं ऐसे मर जाऊ,
अभी तो बहुत काम बाकी हैं
सिर्फ मुझ से न पूछो मेरा हाल,
मुझ से बत्तर भी लोग काफी हैं
जब मैंने किसी का बुरा नहीं चाहा,
तो मैं क्यों किसी की सज़ा काटूं ?
जब मैंने कुछ किया ही नहीं,
तो मैं क्यों किसी और का दर्द बाटूँ?
सहमा सा मैं हो गया हूँ,
आजकल के माहौल से,
पता नहीं कब आयेगा नया सूरज
और उठाएगा मुझे यह बोलके ...
कि मत डर और मेरे देश !
यह बुरा वक़्त भी गुज़र जायेगा,
क्यूंकि वक़्त की खासियत ही यह है मेरे दोस्त
कि कल दोबारा - यह वापस नहीं आएगा.....
By Rishabh Jain

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