सलामत
By Vikas Kumar
वो दुनिया जिसे कभी बनाई थी हमने जन्नत।
जिसके लिए फिर की आपसे कई बार मिन्नत।
मैंने कभी नही चाहा आप पर फकत मिल्कियत।
आपको क्यूं ऐसा लगा की ऐसी है मेरी तबियत।
मैंने तो फकत चाहा था आपकी शहबत।
पर कभी मिल न सकी आपकी शफकत।
लिखा नही था शायद वैसा हमारा किस्मत।
बेवजह की नाराजगी हीं मिली और नफरत।
फिर भी मेरी अब तक बस वही है फितरत।
आपकी चाहत हीं है अब भी मेरी इबादत।
दिल में अब भी सुलगती है बस वही मुहब्बत।
शब ए हिज्र में अब भी हूं आजार ओ अजीयत।
मैं नहीं जानता ये रस्में और इनकी रवायत।
ये यादें रहेंगी मेरे संग बनके मेरी अमानत।
मुंतजिर हीं रहूंगा इस दहर में ता-क़यामत।
कयामत के बाद भी चाहूंगा आप रहे सलामत।
By Vikas Kumar

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