सरदार ऊधम सिंह
By Mrs Paramjeet Kaur Jagir Singh Thuain
जलियाँवाला बाग में १३ अप्रैल १९१९ को हुआ एक हत्याकाण्ड,
जिसे देख-सुन काँप गए सबके तन-मन और प्राण ।
बर्बरता की अन्धी आग में हजारों निर्दोष बलि चढ गए,
जाते-जाते उसके निशान जलियाँवाला बाग के सुपुर्द कर गए।
वे बच्चे थे,जवान थे सुहागिनें थे,कुछ बिनबिहाई थी,
इनकी बलि ने ब्रिटिश सत्ता के मुहँ मल दी काली सियाही थी।
खुदा की कुदरत थी या कुदरत का ही कोई न्याय था,
वहीं एक बच्चा बच गया ऊधम सिंह जिसका नाम था।
लाशों पटा रक्त रंजित भयंकर जो दृश्य देखा ,
उसका बदला लेने की खींच ली मन पर अमिट रेखा।
,मायकल ओडवायर को न छोडेगा उसे अपने हाथों मार डालेगा,
उसकी तलाश में चप्पा-चप्पा खंगाल डालेगा।
वर्ष बीते ,बचपन बीता ,जवानी सिर उठा रही थी,
साथ ही बदले की भावना जवान होती जा रही थी।
अपनी इच्छा पूर्ति हेतु वह जा पहुँचा सीधा लण्डन,
हर जगह ढूंढते ओडवायर को उसके पागल नयन।
आखिर पता लगा लिया एक दिन अपने शिकार का,
बरसों से जिसके लिए उसकी साँसो को भी इन्तजार था।
अब ऊधम ने ओडवायर की दिनचर्या को खंगाल डाला,
बदला लेने की अपनी तलवार को और माँज डाला।
१२ मार्च १९४० को ओडवायर इंग्लैंड लॉर्ड की बैठक में आने वाला है,
नहीं जानता था कि उसी दिन उसका प्राणपखेरू उडने वाला है।
भाषण देने हेतु आमंत्रित किया गया ओडवायर को,
उधर ऊधम के हाथ भी तत्पर थे करने फायर को।
फिर क्या था हटो-हटो कहता ऊधम भीड चीर आगे आ गया
पलक झपकते ही फयरिंग कर लक्ष्य पूर्ति में सफलता पा गया।
उसने विदेशी सरजमीं पर देशबंधुयों की मौत का बदला ले लिया,
भागा नहीं स्वयम् को ब्रिटिश हुकूमत के सुपुर्द कर दिया।
२६ जुलाई१९४० को शहीद हो अपना और देश का नाम बाला कर गया ,
विश्व समक्ष देशभक्ति और बलिदान की मिसाल कायम कर गया।
By Mrs Paramjeet Kaur Jagir Singh Thuain

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