सर कलम
By Sushant Saurabh
गर्दन खींची हुई
रबर जैसे
कांपती, चिंगाढ़ से।
नाचते तलवार, उत्सुकता से।
छीलबिलाता देह
भयभीत
अपने बारी का इंतजार करते
फरफराते मुर्गे जब
कसाई का हाथ, आता देख
अपनी ओर
मिमियाते भेड़ दीवार से चिपके
वैसे ही समय के चक्र से लड़ते
कोई करिश्मा,
नहीं।
कुछ देखने वालों की गीली आँखें
कुछ के गीले होठ, खिलखिलाते
तमाशा देखने आए
गर्जन, और घंटा
सब शांत।
तलवार उठी, सरसरती हुई
हवा को चीड़ती आ गिरी
सांय से, सन
आह कहीं से, कहीं सांसे रुकी हुई
अट्टहास
बड़ी जोर की अट्टहास।
सब चकित, सब भ्रमित
क्या हुआ
तुम जीवित कैसे?
हाथ से गिरी तलवार
गिरा जल्लाद, बेहोश होकर।
कोई करिश्मा,
हाँ।
गर्दन खींची हुई
रबर जैसे
By Sushant Saurabh

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